मगर (ऐ हबीब!) अल्लाह गवाही देता है उस वह़ी की जो उसने आपको अपनी [472]इल्म के साथ भेजी है [473], और फ़रिश्ते भी गवाही देते हैं [474], और अल्लाह गवाही के लिए काफी है।
अल्लाह की यह गवाही इस बात का ऐलान है कि उन्होंने अपने हबीब ﷺ को नबूवत के लिए चुना है — न सिर्फ़ मौजूदा उम्मत के लिए, बल्कि पिछली किताबों में भी उनका ज़िक्र किया गया है।
📌 इससे हुज़ूर ﷺ का मर्तबा और ऊँचाई ज़ाहिर होती है — कि उनकी सच्चाई के लिए सबसे बड़ी गवाही खुद अल्लाह की है।
“अपने इल्म के साथ” का मतलब यह है कि:
📖 जैसे अल्लाह ने फ़रमाया:
📌 यह कुरआन कोई साधारण किताब नहीं, बल्कि इल्म-ए-लौही (अल्लाह का विशेष ज्ञान) है।
इसलिए इसका हर लफ़्ज़, हर हुक्म, और हर इल्म — सिर्फ़ मुहम्मद ﷺ के ज़रिए ही इंसानों तक पहुंचा।
💬 एक शायर ने क्या खूब कहा:
“उसने पूरी मख़लूक़ में तुमसा कोई नहीं पाया।”
📖 और कुरआन फ़रमाता है:
“अल्लाह भली-भाँति जानता है कि नबूवत कहाँ रखनी है।” (सूरा अल-अनआम 6:124)
🔸 बेजोड़ रसूल के लिए अल्लाह ने बेजोड़ किताब नाज़िल की।
यहाँ अल्लाह के बाद फरिश्तों की गवाही का ज़िक्र है, जो दिखाता है कि:
📌 मिअराज की रात, तमाम नबियों ने हुज़ूर ﷺ की इमामत में नमाज़ अदा की —
यह उनकी अंतिम नबूवत की सार्वभौमिक स्वीकृति थी।
📌 क़यामत के दिन, हर नबी हुज़ूर ﷺ का कलिमा पढ़ेगा,
जो इस बात का सबूत है कि फ़रिश्तों और तमाम नबियों ने हुज़ूर ﷺ को आख़िरी रसूल माना।
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सूरह अन-निसा आयत 166 तफ़सीर