कुरान - 4:166 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

166
لَّـٰكِنِ ٱللَّهُ يَشۡهَدُ بِمَآ أَنزَلَ إِلَيۡكَۖ أَنزَلَهُۥ بِعِلۡمِهِۦۖ وَٱلۡمَلَـٰٓئِكَةُ يَشۡهَدُونَۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ شَهِيدًا

अनुवाद -

मगर (ऐ हबीब!) अल्लाह गवाही देता है उस वह़ी की जो उसने आपको अपनी [472]इल्म के साथ भेजी है [473], और फ़रिश्ते भी गवाही देते हैं [474], और अल्लाह गवाही के लिए काफी है।

सूरह अन-निसा आयत 166 तफ़सीर


📖 सूरा अन-निसा – आयत 166 की तफ़्सीर

 

✅ [472] अल्लाह की गवाही रसूल ﷺ के हक़ में

अल्लाह की यह गवाही इस बात का ऐलान है कि उन्होंने अपने हबीब ﷺ को नबूवत के लिए चुना है — न सिर्फ़ मौजूदा उम्मत के लिए, बल्कि पिछली किताबों में भी उनका ज़िक्र किया गया है

  • हुज़ूर ﷺ के सच्चे नबी होने की गवाही किसी इंसानी प्रमाण या अदालत की मोहताज नहीं,
    क्योंकि ख़ुद अल्लाह ने उनकी नबूवत पर मोहर लगाई है, जैसे एक बादशाह की मुहर किसी दस्तावेज़ को सत्यापित करती है।

📌 इससे हुज़ूर ﷺ का मर्तबा और ऊँचाई ज़ाहिर होती है — कि उनकी सच्चाई के लिए सबसे बड़ी गवाही खुद अल्लाह की है

✅ [473] अल्लाह के इल्म के साथ उतरी वह़ी

“अपने इल्म के साथ” का मतलब यह है कि:

  • कुरआन वो किताब है जो अल्लाह के विशेष और गूढ़ ज्ञान पर आधारित है,
    जिसे केवल मुहम्मद ﷺ जैसे पाकीज़ा और चुने हुए नबी को ही दिया गया

📖 जैसे अल्लाह ने फ़रमाया:

  • “वह अपने राज़ किसी पर ज़ाहिर नहीं करता, सिवाय उस रसूल के जिसे वह पसंद करता है” (सूरा जिन्न 72:27)
  • “और हमने तुम्हारी तरफ वह किताब नाज़िल की जो हर चीज़ को स्पष्ट करती है” (सूरा नहल 16:89)

📌 यह कुरआन कोई साधारण किताब नहीं, बल्कि इल्म-ए-लौही (अल्लाह का विशेष ज्ञान) है।
इसलिए इसका हर लफ़्ज़, हर हुक्म, और हर इल्म — सिर्फ़ मुहम्मद ﷺ के ज़रिए ही इंसानों तक पहुंचा

💬 एक शायर ने क्या खूब कहा:
“उसने पूरी मख़लूक़ में तुमसा कोई नहीं पाया।”

📖 और कुरआन फ़रमाता है:
“अल्लाह भली-भाँति जानता है कि नबूवत कहाँ रखनी है।” (सूरा अल-अनआम 6:124)
🔸 बेजोड़ रसूल के लिए अल्लाह ने बेजोड़ किताब नाज़िल की।

✅ [474] फ़रिश्तों की गवाही

यहाँ अल्लाह के बाद फरिश्तों की गवाही का ज़िक्र है, जो दिखाता है कि:

  • कुरआन की वह़ी जब उतरी, फ़रिश्ते उसके गवाह थे,
    और उन्होंने देखा कि हुज़ूर ﷺ पर अल्लाह का इल्हाम नाज़िल हुआ

📌 मिअराज की रात, तमाम नबियों ने हुज़ूर ﷺ की इमामत में नमाज़ अदा की
यह उनकी अंतिम नबूवत की सार्वभौमिक स्वीकृति थी

📌 क़यामत के दिन, हर नबी हुज़ूर ﷺ का कलिमा पढ़ेगा,
जो इस बात का सबूत है कि फ़रिश्तों और तमाम नबियों ने हुज़ूर ﷺ को आख़िरी रसूल माना

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