Transliteration: (Wa maazaa 'alaihim law aamanoo billaahi wal Yawmil Aakhiri wa anfaqoo mimmaa razaqahumul laah; wa kaanallaahu bihim 'aleemaa)
इस आयत से तीन अहम हिदायतें सामने आती हैं:
1. अल्लाह की दी हुई रोज़ी में से कुछ हिस्सा ख़र्च करना चाहिए — यहाँ "कुछ" शब्द यह जताता है कि थोड़ी-सी रकम भी अगर दिल से दी जाए तो क़बूल है।
2. पूरा माल दे देना मना है — इस्लाम में अतिवाद नहीं, बल्कि संतुलन की तालीम दी गई है। इंसान को अपनी ज़रूरतें और जिम्मेदारियाँ भी निभानी चाहिए।
3. सिर्फ़ हलाल कमाई से ही ख़ैरात करनी चाहिए — क्योंकि अल्लाह ने जो कुछ दिया है, वही ख़र्च करने को कहा गया है। इससे यह बात वाज़ेह होती है कि ख़ैरात वही क़बूल होती है जो पाक-साफ़ और हलाल कमाई से हो।
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