कुरान - 4:39 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

39
وَمَاذَا عَلَيۡهِمۡ لَوۡ ءَامَنُواْ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَأَنفَقُواْ مِمَّا رَزَقَهُمُ ٱللَّهُۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِهِمۡ عَلِيمًا

Transliteration: (Wa maazaa 'alaihim law aamanoo billaahi wal Yawmil Aakhiri wa anfaqoo mimmaa razaqahumul laah; wa kaanallaahu bihim 'aleemaa)

और उन्हें क्या नुकसान होता अगर वे अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान ले आते और उस में से कुछ ख़र्च करते जो अल्लाह ने उन्हें दिया है? और निःसंदेह अल्लाह उन्हें भली-भांति जानता है। [151] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 39 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 39 की तफ़्सीर

 

✅ [151] सच्चे ईमान और ख़ैरात की तर्ज़ीह

इस आयत से तीन अहम हिदायतें सामने आती हैं:
1. अल्लाह की दी हुई रोज़ी में से कुछ हिस्सा ख़र्च करना चाहिए — यहाँ "कुछ" शब्द यह जताता है कि थोड़ी-सी रकम भी अगर दिल से दी जाए तो क़बूल है।
2. पूरा माल दे देना मना है — इस्लाम में अतिवाद नहीं, बल्कि संतुलन की तालीम दी गई है। इंसान को अपनी ज़रूरतें और जिम्मेदारियाँ भी निभानी चाहिए।
3. सिर्फ़ हलाल कमाई से ही ख़ैरात करनी चाहिए — क्योंकि अल्लाह ने जो कुछ दिया है, वही ख़र्च करने को कहा गया है। इससे यह बात वाज़ेह होती है कि ख़ैरात वही क़बूल होती है जो पाक-साफ़ और हलाल कमाई से हो।

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