कुरान - 4:37 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

37
ٱلَّذِينَ يَبۡخَلُونَ وَيَأۡمُرُونَ ٱلنَّاسَ بِٱلۡبُخۡلِ وَيَكۡتُمُونَ مَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦۗ وَأَعۡتَدۡنَا لِلۡكَٰفِرِينَ عَذَابٗا مُّهِينٗا

Transliteration: (Allazeena yabkhaloona wa ya'muroonan naasa bilbukhli wa yaktumoona maaa aataahu mullaahu min fadlih; wa a'tadnaa lilkaafireena 'azaabam muheenaa)

वे लोग जो कंजूसी करते हैं, और दूसरों को भी कंजूसी करने को कहते हैं, और जो कुछ अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़्ल से दिया है, उसे छिपाते हैं [146]... और हमनें इनकार करने वालों के लिए अपमानजनक सज़ा तैयार कर रखी है [148]. (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 37 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 37 की तफ़्सीर

 

✅ [146] दौलत और ज़िम्मेदारियों में कंजूसी

कंजूसी केवल धन तक सीमित नहीं है — इसमें शामिल है:
ज़कात या फ़र्ज़ सदक़ा न देना,
बीवी-बच्चों के खर्च में कोताही करना,
और फ़ायदेमंद इल्म को छिपाना।
सच्चे मोमिन को चाहिए कि वह दौलत और ज्ञान दोनों में खुलापन और दरियादिली दिखाए।

✅ [147] अल्लाह की नेमतें छिपाना ना-शुक्री है

इसमें शामिल है:
दुनियावी नेमतें,
दीन का इल्म,
या रूहानी फ़हम व बस़ीरत को छुपाना।
इससे यह सीख मिलती है कि:
अल्लाह की नेमतों का इज़हार शुकर का हिस्सा है,
लेकिन ग़ुरूर और घमंड सख़्त मना है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
मैं आदम (अलैहिस्सलाम) की औलाद में सबसे आला हूँ, लेकिन मुझे इस पर फख्र नहीं।
यह सिखाता है कि अल्लाह की दी हुई बड़ाई को मानना चाहिए, मगर इन्कार और घमंड के बिना।

✅ [148] नबी ﷺ की सिफ़ात को छुपाना कुफ्र है

यह आयत उन यहूदी उलमा के बारे में उतरी,
जिन्होंने तौरात में नबी ﷺ की पहचान और गुणों को जानबूझकर छिपाया।
मुख्य बात:
नबी ﷺ के फ़ज़ाइल को छिपाना, तोड़-मरोड़ कर पेश करना या इनकार करना — एक संगीन गुनाह है और कुफ्र तक ले जा सकता है।
आज के उलमा को सबक लेना चाहिए:
जो लोग नाअत पढ़ने से रोकते हैं या उसमें रुकावट डालते हैं, वे भी उन्हीं की राह पर हैं जिनकी मज़म्मत इस आयत में की गई है।

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