कुरान - 4:36 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

36
۞وَٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَلَا تُشۡرِكُواْ بِهِۦ شَيۡـٔٗاۖ وَبِٱلۡوَٰلِدَيۡنِ إِحۡسَٰنٗا وَبِذِي ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡيَتَٰمَىٰ وَٱلۡمَسَٰكِينِ وَٱلۡجَارِ ذِي ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡجَارِ ٱلۡجُنُبِ وَٱلصَّاحِبِ بِٱلۡجَنۢبِ وَٱبۡنِ ٱلسَّبِيلِ وَمَا مَلَكَتۡ أَيۡمَٰنُكُمۡۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ مَن كَانَ مُخۡتَالٗا فَخُورًا

Transliteration: (Wa'budul laaha wa laa tushrikoo bihee shai'anw wa bilwaalidaini ihsaananw wa bizil qurbaa walyataamaa walmasaakeeni waljaari zilqurbaa waljaaril junubi wassaahibi biljambi wabnis sabeeli wa maa malakat aimaanukum; innal laaha laa yuhibbu man kaana mukhtaalan fakhooraa)

अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को साझी न बनाओ। माता-पिता के साथ [141], रिश्तेदारों, यतीमों, मोहताजों, क़रीबी पड़ोसियों और दूर के पड़ोसियों [142], अपने पास बैठे साथी [143], मुसाफ़िर [144], और उन लोगों के साथ [145] भलाई करो जो तुम्हारे अधिकार में हैं। निश्चय ही अल्लाह घमंडी और डींग मारने वालों को पसंद नहीं करता। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 36 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अन-निसा — आयत 36 की तफ़्सीर

 

✅ माता-पिता का दर्जा — इबादत के बाद सबसे ऊपर है [141]

  • अल्लाह ने माता-पिता की ख़िदमत को अपनी इबादत के बाद रखा है, जो इसकी अहमियत को ज़ाहिर करता है।
  • माता-पिता की सेवा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि जज़्बाती और आर्थिक स्तर पर भी की जानी चाहिए।
  • रिश्तेदारों में सबसे ज़्यादा हक़ माता-पिता का है।

✅ पड़ोसियों की कई क़िस्में हैं और सबके साथ अच्छा बर्ताव जरूरी है [142]

  • पड़ोसियों में शामिल हो सकते हैं:
    • बिल्कुल क़रीबी (आपके मकान से सटा हुआ),
    • दूर का पड़ोसी (आपकी गली में लेकिन साथ नहीं),
    • रिश्तेदार पड़ोसी,
    • गैर-रिश्तेदार लेकिन मुसलमान पड़ोसी,
    • और गैर-मुस्लिम पड़ोसी।
  • हर एक का अलग स्तर का हक़ है, लेकिन सबके साथ भलाई का हुक्म है।

📚 तफ्सीर रूहुल बयान में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है।

✅ "साथी" के कई मतलब हो सकते हैं [143]

  • "साथ का साथी" से मुराद हो सकते हैं:
    • बीवी/शौहर,
    • सफ़र का साथी,
    • दफ़्तर या काम का साथी,
    • मस्जिद में साथ इबादत करने वाला,
    • या कोई ऐसा जो अक्सर आपके साथ बैठता हो।
  • इन सभी के साथ हुस्न-ए-सुलूक (अच्छे व्यवहार) का हुक्म है।

📚 ख़ज़ाइनुल इरफान से रूहानी मतलब लिया गया है।

✅ मुसाफ़िर और मेहमान — इस्लाम में मुक़द्दस हैं [144]

  • "मुसाफ़िर" से मुराद हो सकते हैं:
    • रास्ते में मदद का मुहताज मुसाफ़िर,
    • या आपके घर आने वाला मेहमान।
  • मेहमान नवाज़ी को इस्लामी किरदार का अहम हिस्सा माना गया है।
  • लेकिन अगर कोई व्यक्ति दुनियावी काम (जैसे व्यापार, वकालत या दीनी मसले) से रुका हुआ है, तो वो शरीअत के मुताबिक "मेहमान" की हद में नहीं आता।

✅ नौकर और घरेलू कामगारों के भी हक़ हैं [145]

  • "जिनके तुम मालिक हो" से मुराद हैं:
    • घरेलू नौकर-नौकरानियाँ।
  • उनके साथ व्यवहार में चाहिए:
    • ज़ुल्म ना हो,
    • सख़्त लहज़ा ना हो,
    • खाना-कपड़ा ज़रूरत के मुताबिक दिया जाए।
  • इनके हक़ अल्लाह की बारगाह में ज़िम्मेदारी हैं — चाहे वो अदालत से ना माँग सकें, लेकिन इंसाफ़ अल्लाह के यहाँ ज़रूर होगा।

📚 इस बात को इस्लामी फ़ुक़हा और क्लासिकल तफ़्सीर में साफ़ तौर पर बयान किया गया है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now