कुरान - 4:34 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

34
ٱلرِّجَالُ قَوَّـٰمُونَ عَلَى ٱلنِّسَآءِ بِمَا فَضَّلَ ٱللَّهُ بَعۡضَهُمۡ عَلَىٰ بَعۡضٖ وَبِمَآ أَنفَقُواْ مِنۡ أَمۡوَٰلِهِمۡۚ فَٱلصَّـٰلِحَٰتُ قَٰنِتَٰتٌ حَٰفِظَٰتٞ لِّلۡغَيۡبِ بِمَا حَفِظَ ٱللَّهُۚ وَٱلَّـٰتِي تَخَافُونَ نُشُوزَهُنَّ فَعِظُوهُنَّ وَٱهۡجُرُوهُنَّ فِي ٱلۡمَضَاجِعِ وَٱضۡرِبُوهُنَّۖ فَإِنۡ أَطَعۡنَكُمۡ فَلَا تَبۡغُواْ عَلَيۡهِنَّ سَبِيلًاۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيّٗا كَبِيرٗا

Transliteration: (Arrijaalu qawwaamoona 'alan nisaaa'i bimaa fad dalallaahu ba'dahum 'alaa ba'dinw wa bimaaa anfaqoo min amwaalihim; fassaalihaatu qaanitaatun haafizaatul lil ghaibi bimaa hafizal laah; wallaatee takhaafoona nushoo zahunna fa 'izoohunna wahjuroohunna fil madaaji'i wadriboohunna fa in ata'nakum falaa tabghoo 'alaihinna sabeelaa; innallaaha kaana 'Aliyyan Kabeeraa)

पुरुष महिलाओं पर क़व्वाम (अध्यक्ष) हैं [131], क्योंकि अल्लाह ने उनमें से एक को दूसरे पर श्रेष्ठ बनाया है [132], और क्योंकि वे अपने माल से खर्च करते हैं [133]। इसलिए नेक औरतें फ़रमाबरदार होती हैं और ग़ैर-हाज़िरी में अल्लाह के हुक्म के अनुसार उनकी निगरानी करती हैं [134]। और जिन औरतों से तुम नाफ़रमानी का अंदेशा रखते हो, उन्हें समझाओ [135], बिस्तर में उनसे अलग हो जाओ [136], और (आख़िरी उपाय के तौर पर) हल्की मार मारो [137]। फिर अगर वे इताअत कर लें तो उनके ख़िलाफ़ कोई रास्ता न ढूँढो। निःसंदेह, अल्लाह बहुत बुलंद, बहुत बड़ा है [138]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 34 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अन-निसा – आयत 34 की तफ़्सीर

 

✅ [131] मर्दों की ज़िम्मेदारी अधिक है

इससे यह बात स्पष्ट होती है कि शादीशुदा ज़िंदगी में पुरुषों और महिलाओं की ज़िम्मेदारियाँ बराबर नहीं हैं।
पुरुष पर पूरा आर्थिक बोझ होता है, जिसमें रोज़ी कमाना, घर की देखभाल, और मेहर देना शामिल है।
महिलाओं पर कोई आर्थिक फ़र्ज़ नहीं है, इसलिए पुरुष को नेतृत्व की ज़िम्मेदारी दी गई है।
यह बराबरी नहीं बल्कि इंसाफ़ है, जो अल्लाह की हिकमत के मुताबिक़ है।

✅ [132] श्रेष्ठता ज़िम्मेदारी में है, इज़्ज़त में नहीं

इस्लाम ने मर्दों को कुछ मामलों में कार्यक्षमता की श्रेष्ठता दी है जैसे:

  • पैग़म्बरी,
  • धार्मिक नेतृत्व (इमामत),
  • क़ाज़ी की ज़िम्मेदारी,
  • अज़ान और खुत्बा।

इनमें परदा निभाते हुए औरतों की भूमिका सीमित होती है।
हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं कि हर मर्द हर औरत से बेहतर है।
हज़रत आइशा और फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) जैसी महान महिलाएँ, बहुत से मर्दों से बेहतर हैं।
लैंगिक भेद सिर्फ़ भूमिका तय करता है, इज़्ज़त नहीं।

✅ [133] मर्द को दर्जा मिलने का कारण

मर्द को जो दर्जा मिला है, वह दो वजहों से है:

  • जैविक रूप से मर्द पैदा होना,
  • घर खर्च उठाना।
    अगर कोई मर्द खर्च ना भी करे, तब भी कार्यात्मक नेतृत्व उसका रहेगा, भले ही अख़लाक़ी श्रेष्ठता उससे अलग हो।

✅ [134] शादीशुदा ज़िम्मेदारियाँ और अधिकार

यह आयत बताती है कि शादी में:

  • मर्द को खर्च करने की ज़िम्मेदारी है,
  • औरत को घर की देखभाल और शौहर की इज़्ज़त करनी चाहिए।

नेक बीवियाँ अपने शौहर की गैर-हाज़िरी में उनकी इज़्ज़त और घर की हिफ़ाज़त करती हैं।
उसे शौहर को नाम से नहीं बुलाना चाहिए, न ही घर के कामों में बोझ डालना चाहिए।
मर्द कमाता है, और औरत खर्च करती है — यही तर्ज़े-ज़िंदगी रहमत का सबब बनती है।
औरत अगर काम करे तो गुनाह नहीं, लेकिन शरई तौर पर उस पर काम करना फ़र्ज़ नहीं है।

✅ [135] पहला क़दम: समझाना और नसीहत देना

अगर बीवी नाफ़रमान हो जाए, तो सबसे पहले:

  • अच्छे अंदाज़ में समझाया जाए,
  • दीन की बातों से उसे आगाह किया जाए,
  • सहनशीलता और इल्म के साथ उसे हिदायत दी जाए।

✅ [136] दूसरा क़दम: बिस्तर से जुदाई

अगर नसीहत असर न करे, तो:

  • बिस्तर अलग कर लिया जाए,
  • रात गुज़ारने से परहेज़ किया जाए,
  • बातचीत और मुलाक़ात बंद की जाए,
    ताकि इमोशनल दूरी से वह अपनी ग़लती पर ग़ौर करे।
    यह तरीक़ा सम्मानजनक और असरदार साबित होता है।

✅ [137] तीसरा क़दम: हल्की और प्रतीकात्मक मार

अगर ये दोनों तरीक़े नाकाम हों, तो:

  • बहुत हल्की और बिना नुक़सान पहुँचाने वाली मार की इजाज़त है,
  • जो केवल प्रतीकात्मक हो, और इस्लाह की नीयत से हो।

इससे यह सबक़ मिलता है कि:
नेतृत्व करने वाले को अनुशासन का हक़ है, जैसे:

  • उस्ताद का शागिर्द पर,
  • बाप का बेटे पर।
    लेकिन:
  • ज़ुल्म और मारपीट की कोई इजाज़त नहीं,
  • और बीवी को मर्द पर जवाबी मार की इजाज़त नहीं।

✅ [138] अगर वह इताअत कर ले तो माफ़ कर दो

अगर बीवी वापस फ़रमाबरदारी पर आ जाए, तो:

  • माज़ी को लेकर शिकवा ना करो,
  • न कोई सज़ा दो, न बदला लो।
    जैसे अल्लाह माफ़ करता है,
    मर्द को भी रहम और बुज़ुर्गी का सबूत देना चाहिए।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now