Transliteration: (Arrijaalu qawwaamoona 'alan nisaaa'i bimaa fad dalallaahu ba'dahum 'alaa ba'dinw wa bimaaa anfaqoo min amwaalihim; fassaalihaatu qaanitaatun haafizaatul lil ghaibi bimaa hafizal laah; wallaatee takhaafoona nushoo zahunna fa 'izoohunna wahjuroohunna fil madaaji'i wadriboohunna fa in ata'nakum falaa tabghoo 'alaihinna sabeelaa; innallaaha kaana 'Aliyyan Kabeeraa)
इससे यह बात स्पष्ट होती है कि शादीशुदा ज़िंदगी में पुरुषों और महिलाओं की ज़िम्मेदारियाँ बराबर नहीं हैं।
पुरुष पर पूरा आर्थिक बोझ होता है, जिसमें रोज़ी कमाना, घर की देखभाल, और मेहर देना शामिल है।
महिलाओं पर कोई आर्थिक फ़र्ज़ नहीं है, इसलिए पुरुष को नेतृत्व की ज़िम्मेदारी दी गई है।
यह बराबरी नहीं बल्कि इंसाफ़ है, जो अल्लाह की हिकमत के मुताबिक़ है।
इस्लाम ने मर्दों को कुछ मामलों में कार्यक्षमता की श्रेष्ठता दी है जैसे:
इनमें परदा निभाते हुए औरतों की भूमिका सीमित होती है।
हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं कि हर मर्द हर औरत से बेहतर है।
हज़रत आइशा और फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) जैसी महान महिलाएँ, बहुत से मर्दों से बेहतर हैं।
लैंगिक भेद सिर्फ़ भूमिका तय करता है, इज़्ज़त नहीं।
मर्द को जो दर्जा मिला है, वह दो वजहों से है:
यह आयत बताती है कि शादी में:
नेक बीवियाँ अपने शौहर की गैर-हाज़िरी में उनकी इज़्ज़त और घर की हिफ़ाज़त करती हैं।
उसे शौहर को नाम से नहीं बुलाना चाहिए, न ही घर के कामों में बोझ डालना चाहिए।
मर्द कमाता है, और औरत खर्च करती है — यही तर्ज़े-ज़िंदगी रहमत का सबब बनती है।
औरत अगर काम करे तो गुनाह नहीं, लेकिन शरई तौर पर उस पर काम करना फ़र्ज़ नहीं है।
अगर बीवी नाफ़रमान हो जाए, तो सबसे पहले:
अगर नसीहत असर न करे, तो:
अगर ये दोनों तरीक़े नाकाम हों, तो:
इससे यह सबक़ मिलता है कि:
नेतृत्व करने वाले को अनुशासन का हक़ है, जैसे:
अगर बीवी वापस फ़रमाबरदारी पर आ जाए, तो:
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