कुरान - 4:32 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
وَلَا تَتَمَنَّوۡاْ مَا فَضَّلَ ٱللَّهُ بِهِۦ بَعۡضَكُمۡ عَلَىٰ بَعۡضٖۚ لِّلرِّجَالِ نَصِيبٞ مِّمَّا ٱكۡتَسَبُواْۖ وَلِلنِّسَآءِ نَصِيبٞ مِّمَّا ٱكۡتَسَبۡنَۚ وَسۡـَٔلُواْ ٱللَّهَ مِن فَضۡلِهِۦٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٗا

Transliteration: (Wa laa tatamannaw maa faddalal laahu bihee ba'dakum 'alaa ba'd; lirrijaali naseebum mimmak tasaboo wa linnisaaa'i naseebum mimmak tasabn; was'alullaaha min fadlih; innal laaha kaana bikulli shai'in 'Aleemaa)

और जो कुछ अल्लाह ने तुममें से कुछ लोगों को दूसरों पर फज़ीलत दी है, उसकी हसरत मत करो [122]। मर्दों के लिए उनके किए का हिस्सा है [123], और औरतों के लिए उनके किए का हिस्सा है [124]। और अल्लाह से उसकी फज़ल (मेहरबानी) मांगो [125]। निःसंदेह, अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है [126]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अन-निसा – आयत 32 की तफ़्सीर

 

✅ [122] हसद (ईर्ष्या) हराम है और गुनाहों की जड़ है

इससे यह पता चलता है कि:
हसद केवल मना ही नहीं, बल्कि गुनाहों की जड़ भी है।
इब्लीस भी हसद की वजह से ही गुमराह हुआ।
हसद का मतलब है — किसी की नेमत देखकर जलना, और उसके लिए बुराई चाहना,
साथ ही वह नेमत अपने लिए चाहना।

घिब्ता (Ghabta) यानी दूसरे की दीनी नेमत देखकर वैसा ही नेक बनना चाहना,
यह दुनियावी मामलों में मना है, लेकिन दीनी मामलों में जायज़ है।

✅ [123] हर शख़्स अपने अमल का मोहताज है

इससे यह सीख मिलती है कि:
नेक बीवी होने के बावजूद शौहर के अच्छे अमल से कोई बेनियाज़ नहीं हो सकता,
और न ही कोई नेक शौहर, अपनी बीवी के अमल से बेनियाज़ हो सकता है।
हर इंसान को अपने अमल की ज़रूरत है।

✅ [124] मर्द-औरत के लिए अलग-अलग जिम्मेदारियाँ और सवाब

इस आयत का सबब-ए-नुज़ूल:
हज़रत उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने कहा कि अगर हम औरतें मर्द होतीं,
तो हम भी जिहाद में शरीक होतीं।
इस पर यह आयत नाज़िल हुई।

अल्लाह तआला फ़रमाता है:
हर शख़्स को उसकी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए,
उसी के मुताबिक़ सवाब मिलेगा।

बीवी अगर अपने शौहर के घर की हिफाज़त करे, तो उसे भी जिहाद का सवाब मिल सकता है।
इससे यह भी सबक़ मिलता है कि:
औरत पर पर्दे के साथ घर में रहना वाजिब है।

✅ [125] अल्लाह की फज़ल ही हर काम की कुंजी है

अगर अल्लाह अपनी फज़ल (कृपा) नाज़िल करे,
तो वह थोड़े अमल पर भी ज़्यादा सवाब अता कर सकता है।
इससे यह साबित होता है कि:
बिना अल्लाह की फज़ल के कोई कुछ हासिल नहीं कर सकता।
इसलिए:
हर दुआ में अल्लाह से उसकी फज़ल मांगनी चाहिए।
क्योंकि यह एक मुकम्मल और उम्दा दुआ है।

✅ [126] अल्लाह का हर फैसला इल्म और हिकमत पर आधारित है

अल्लाह ने जो भी किसी को दिया है,
वह पूरे इल्म और हिकमत के साथ दिया है।
इसलिए:
किसी की नेमत पर जलना, दरअसल अल्लाह के फैसले पर एतराज़ करना है।

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