कुरान - 4:51 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

51
أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ أُوتُواْ نَصِيبٗا مِّنَ ٱلۡكِتَٰبِ يُؤۡمِنُونَ بِٱلۡجِبۡتِ وَٱلطَّـٰغُوتِ وَيَقُولُونَ لِلَّذِينَ كَفَرُواْ هَـٰٓؤُلَآءِ أَهۡدَىٰ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ سَبِيلًا

Transliteration: (Alam tara ilal lazeena 'ootoo naseebam minal kitaabi yu'minoona bil Jibti wat Taaghooti wa yaqooloona lillazeena kafaroo haaa ulaaa'i ahdaa minal lazeena aamanoo sabeelaa)

क्या आपने उन्हें नहीं देखा [184] जिन्हें किताब में से कुछ हिस्सा दिया गया था [185]? वे तावीज़ और शैतानों पर ईमान लाते हैं [186], और इनकार करने वालों से कहते हैं: यह (काफ़िर) मोमिनों से ज़्यादा सीधे रास्ते पर हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 51 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 51 की तफ़्सीर

 

✅ [184] इस आयत के उतरने का कारण

यह आयत कअब बिन अशरफ़ और उसके साथियों के बारे में उतरी, जो मक्का के मूर्तिपूजकों के पास गए और उन्हें रसूल ﷺ से लड़ने के लिए उकसाया।
क़ुरैश ने शुरू में हिचकिचाहट दिखाई, क्योंकि यहूदी अहले किताब थे और उन्हें मुसलमानों का पक्षधर समझा जा सकता था।
क़ुरैश ने यह विश्वास दिलाने के लिए उनसे कहा कि वो उनके बुतों को सजदा करें, और उन्होंने वाक़ई ऐसा किया।
बाद में जब अबू सुफ़यान ने पूछा कि कौन सही रास्ते पर है — क़ुरैश या मुहम्मद ﷺ?
तो कअब बिन अशरफ़ ने झूठ बोलते हुए कहा कि क़ुरैश हक़ पर हैं।
यह आयत इसी ग़द्दारी और झूठी गवाही की निंदा में उतरी।

✅ [185] किताब का कुछ हिस्सा – बिना अमल का इल्म

"किताब में से हिस्सा" का मतलब है आंशिक इल्म, लेकिन सही अमल नहीं।
कअब बिन अशरफ़ को इल्म था, लेकिन उसने उसपर अमल नहीं किया।
इससे यह शिक्षा मिलती है कि अल्लाह की किताब दो हिस्सों से मिलकर बनती है:

  • इल्म
  • अमल
    बिना अमल के इल्म अल्लाह की तरफ़ से लानत है।
    अल्लाह हमें दोनों की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

✅ [186] तावीज़ और ताग़ूत – झूठे खुदा

"ताग़ूत" शब्द TAGHA से निकला है, जिसका अर्थ है सरकशी करना।
जब शैतान ने अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी की, तो वह बग़ावत का सरदार बन गया।
जो लोग झूठे खुदाओं की पूजा करते हैं या उनका अनुसरण करते हैं, चाहे वो इंसान हों या जिन्न, वे भी ताग़ूत के दायरे में आते हैं।
कुरआन ने कभी-कभी कुफ़्र के रहनुमाओं को भी शैतान कहा है।
जो कोई रसूल ﷺ को शैतान कहे (अल्लाह माफ़ करे) — जैसे हुसैन अली वान भिचियाँ वाला ने किया — तो वह इस्लाम से बाहर हो जाता है।

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