Transliteration: (Alam tara ilal lazeena yuzakkoona anfusahum; balil laahu yuzakkee mai yashaaa'u wa laa yuzlamoona fateelaa)
इस आयत से यह शिक्षा मिलती है कि अपने आप को पाक या श्रेष्ठ घोषित करना मना है, और ख़ुद से दिए गए उपाधियों जैसे “मिस्टर”, “मौलाना”, “आलिम” आदि को शान दिखाने के लिए इस्तेमाल करना गुनाह की श्रेणी में आता है।
ऐसे कार्य ख़ुद की बड़ाई के दायरे में आते हैं, जिनकी अल्लाह के नज़दीक कोई क़ीमत नहीं — जब तक कि नियत यह न हो कि अल्लाह की नेमतों पर शुक्र अदा किया जाए।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"मैं आदम की औलाद का सरदार हूँ — और मैं यह घमंड से नहीं कहता।"
इससे यह सिद्ध होता है कि अल्लाह की दी हुई नेमतों का ज़िक्र करना जायज़ है, जब तक उसमें घमंड न हो, लेकिन बड़ाई का दावा करना या प्रशंसा हासिल करना मुनासिब नहीं।
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