कुरान - 4:66 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

66
وَلَوۡ أَنَّا كَتَبۡنَا عَلَيۡهِمۡ أَنِ ٱقۡتُلُوٓاْ أَنفُسَكُمۡ أَوِ ٱخۡرُجُواْ مِن دِيَٰرِكُم مَّا فَعَلُوهُ إِلَّا قَلِيلٞ مِّنۡهُمۡۖ وَلَوۡ أَنَّهُمۡ فَعَلُواْ مَا يُوعَظُونَ بِهِۦ لَكَانَ خَيۡرٗا لَّهُمۡ وَأَشَدَّ تَثۡبِيتٗا

Transliteration: (Wa law annaa katabnaa 'alaihim aniqtulooo anfusakum aw ikhrujoo min diyaarikum maa fa'aloohu illaa qaleelum minhum wa law annahum fa'aloo maa yoo'azoona bihee lakaana khairal lahum wa ashadda tasbeetaa)

और अगर हम उन पर यह फ़र्ज़ कर देते कि 'अपने आप को क़त्ल करो' या 'अपने घरों से निकल जाओ', तो उनमें से बहुत थोड़े लोगों के सिवा ऐसा न करते; और अगर वे वही करते जिसकी उन्हें नसीहत की जाती है, तो यह उनके हक़ में बेहतर और (ईमान पर) ज़्यादा साबित क़दम रखने वाला होता; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 66 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अन-निसा - आयत 66

✅ अहकामे इलाही पर अमल में ख़ैर

अल्लाह ने उम्मते मुहम्मदिया पर बनी इसराईल जैसे सख़्त अहकाम मुक़र्रर नहीं फ़रमाए। जो अहकाम दिए गए हैं अगर इंसान उन पर पाबंदी से अमल करे तो उसका ईमान मज़बूत और साबित क़दम रहता है।

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