कुरान - 4:65 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

65
فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤۡمِنُونَ حَتَّىٰ يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيۡنَهُمۡ ثُمَّ لَا يَجِدُواْ فِيٓ أَنفُسِهِمۡ حَرَجٗا مِّمَّا قَضَيۡتَ وَيُسَلِّمُواْ تَسۡلِيمٗا

Transliteration: (Falaa wa Rabbika laa yu'minoona hattaa yuhakkimooka fee maa shajara bainahum summa laa yajidoo feee anfusihim harajam mimmaa qadaita wa yusal limoo tasleemaa)

पस आपके रब की क़सम! ये लोग मोमिन नहीं हो सकते जब तक कि अपने बाहमी झगड़ों में आपको हाकिम (फ़ैसला करने वाला) न मान लें, फिर जो फ़ैसला आप फ़रमा दें उससे अपने दिलों में कोई तंगी न महसूस करें और पूरी तरह फ़रमांबरदारी से उसे तस्लीम न कर लें। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 65 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अन-निसा - आयत 65

✅ फ़ैसले-ए-रसूल पर रज़ामंदी ईमान की शर्त

अल्लाह तआला ने अपनी ज़ात की क़सम खाकर एलान फ़रमाया कि कोई शख़्स उस वक़्त तक कामिल मोमिन नहीं हो सकता जब तक कि हुज़ूर (सल्ल.) के हर फ़ैसले को दिलो-जान से क़बूल न कर ले और ज़रा बराबर भी दिल में मैल न लाए।

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