कुरान - 4:74 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

74
۞فَلۡيُقَٰتِلۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱلَّذِينَ يَشۡرُونَ ٱلۡحَيَوٰةَ ٱلدُّنۡيَا بِٱلۡأٓخِرَةِۚ وَمَن يُقَٰتِلۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ فَيُقۡتَلۡ أَوۡ يَغۡلِبۡ فَسَوۡفَ نُؤۡتِيهِ أَجۡرًا عَظِيمٗا

Transliteration: (Falyuqaatil fee sabeelil laahil lazeena yashroonal hayaatad dunyaa bil Aakhirah; wa may-yuqaatil fee sabeelil laahi fa yuqtal aw yaghlib fasawfa nu'teehi ajran 'azeemaa)

तो वे लोग अल्लाह के रास्ते में लड़ें [236] जो इस दुनिया की ज़िंदगी को आख़िरत के बदले बेच देते हैं [237] और जो कोई अल्लाह के रास्ते में लड़े, फिर वह क़त्ल कर दिया जाए या ग़ालिब आ जाए, तो हम उसे अवश्य बड़ा इनाम देंगे [238] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 74 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अन-निसा – आयत 74 की तफ़्सीर

 

✅ [236] इस्लाम की बुलंदी के लिए लड़ना

अल्लाह के रास्ते में लड़ने से मुराद है इस्लाम की बुलंदी के लिए जिहाद करना और काफ़िरों की ताक़त को तोड़ना, ताकि वे अब मुसलमानों को अल्लाह तआला की इबादत से रोक न सकें। अल्लाह के रास्ते में जंग का असली मक़सद इलाही इबादत और हक़ के रास्ते से रुकावटों को हटाना है — न कि इलाकाई फ़तह या निजी बदला।

✅ [237] जिहाद में ख़ुलूस – दुनियावी मक़सद की कोई जगह नहीं

इस आयत के इस हिस्से से दो बुनियादी उसूल सामने आते हैं:

  • जिहाद कभी भी निजी फ़ायदे के लिए नहीं होना चाहिए।
  • हासिल होने वाला इलाक़ा या माल हमेशा इस्लाम के हित में होना चाहिए।

मुस्लिम मुजाहिद को निडर होकर और कुर्बानी के पुख़्ता इरादे के साथ मैदान में उतरना चाहिए, जैसा कि दुनिया की ज़िंदगी को आख़िरत के बदले बेच देना वाक्य में बयान हुआ है। जब ये दोनों गुण — नीयत की पवित्रता और कुर्बानी का जज़्बा — मौजूद हों, तो अल्लाह की तरफ़ से जीत का वादा है। जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया: तुम ही ग़ालिब आओगे अगर तुममें ईमान होगा (सूरह आले-इमरान 3:13)।

✅ [238] अल्लाह के रास्ते में लड़ने वालों के लिए बड़ा इनाम

बड़े इनाम से मुराद है:

  • फ़तह पाने वाले के लिए: दुनिया में ग़नीमत और आख़िरत में जन्नत।
  • शहीद या हारने वाले के लिए: आख़िरत में बेहद बड़ा इनाम, ख़ासकर जन्नत में दाख़िला।

हर हाल में यह एक इलाही सौदा है जिसमें कोई घाटा नहीं। चाहे नतीजा जीत हो या शहादत, अंजाम इज़्ज़त और हमेशा की कामयाबी है।

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