कुरान - 4:73 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

73
وَلَئِنۡ أَصَٰبَكُمۡ فَضۡلٞ مِّنَ ٱللَّهِ لَيَقُولَنَّ كَأَن لَّمۡ تَكُنۢ بَيۡنَكُمۡ وَبَيۡنَهُۥ مَوَدَّةٞ يَٰلَيۡتَنِي كُنتُ مَعَهُمۡ فَأَفُوزَ فَوۡزًا عَظِيمٗا

Transliteration: (Wa la'in asaabakum fadlum minal laahi la yaqoolanna ka al lam takum bainakum wa bainahoo mawaddatuny yaa laitanee kuntu ma'ahum fa afooza fawzan 'azeemaa)

और अगर तुम्हें अल्लाह की ओर से कोई अनुग्रह [234] मिल जाए, तो वह इस तरह कहेगा, मानो तुम्हारे और उसके बीच कोई मोहब्बत ही न हो [235] — काश! मैं भी उनके साथ होता, तो बड़ी कामयाबी पाता। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 73 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अन-निसा – आयत 73 की तफ़्सीर

 

✅ [234] जीत और ग़नीमत – अल्लाह की ओर से अनुग्रह

यहां अल्लाह की ओर से अनुग्रह से मुराद दुश्मनों पर विजय और ग़नीमत का माल है। मुसलमानों का दृष्टिकोण यह है कि ऐसी कामयाबियां बहादुरी या युद्ध कौशल से नहीं, बल्कि अल्लाह तआला के अनुग्रह और इनाम से मिलती हैं। सच्चे ईमान वाले हर सफलता में अल्लाह की मदद को मानते हैं, जबकि मुनाफ़िक़ सिर्फ़ दुनियावी नतीजों पर ध्यान देते हैं।

✅ [235] वफ़ादारी के बिना लाभ की चाह – मुनाफ़िक़त की निशानी

मुनाफ़िक़, मुसलमानों की कामयाबी देखकर ही उनके साथ होने की इच्छा जताता है, यह कहते हुए कि काश! मैं भी उनके साथ होता, तो बड़ी कामयाबी पाता। यह रवैया दर्शाता है:

  • मुसलमानों से कोई वास्तविक मोहब्बत या वफ़ादारी नहीं।
  • ख़ुदग़र्ज़ी, क्योंकि उसे सिर्फ़ दुनियावी लाभ की चाह है।
  • ईमान और सच्चाई की पूरी कमी।

इससे हमें सबक मिलता है कि सिर्फ़ दुनियावी फ़ायदे के लिए मुसलमानों के साथ होने की इच्छा रखना, जबकि कठिन समय में अनुपस्थित रहना, मुनाफ़िक़त की अलामत है। सच्चे ईमान वालों को ईमान और दुनिया दोनों मामलों में उम्मत के साथ वफ़ादारी, कुर्बानी और सच्चाई के साथ खड़ा रहना चाहिए।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now