कुरान - 4:8 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

8
وَإِذَا حَضَرَ ٱلۡقِسۡمَةَ أُوْلُواْ ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡيَتَٰمَىٰ وَٱلۡمَسَٰكِينُ فَٱرۡزُقُوهُم مِّنۡهُ وَقُولُواْ لَهُمۡ قَوۡلٗا مَّعۡرُوفٗا

Transliteration: (Wa izaa hadaral qismata ulul qurbaa walyataamaa walmasaakeenu farzuqoohum minhu wa qooloo lahum qawlam ma'roofaa)

और जब तक़सीम के वक़्त रिश्तेदार, अनाथ और ज़रूरतमंद [26] मौजूद हों, तो उन्हें भी उसमें से कुछ दो [27], और उनसे अच्छे तरीक़े से बात करो। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 8 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 8 की तफ़्सीर

 

✅ [26] रिश्तेदार, अनाथ और ग़रीबों की मौजूदगी

यहाँ जिन रिश्तेदारों, अनाथों और ज़रूरतमंदों का ज़िक्र है, उनसे मुराद वे लोग हैं जिन्हें विरासत में हिस्सा नहीं मिलता, क्योंकि उनसे नज़दीकी रिश्तेदार हक़दार होते हैं। हज़रत मुहम्मद बिन सीरीन (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि उनके वालिद ने मीरास की तक़सीम के वक़्त एक दुम्बा ज़बह किया और उन ग़रीब रिश्तेदारों को बुलाया जो हक़दार नहीं थे। यह अमल हमदर्दी और समाजिक ख़ुलूस पर आधारित है।

✅ [27] कुछ देना और नैतिक ज़िम्मेदारी

इससे यह बात समझ आती है: अगर किसी पोते को उसके चाचा की मौजूदगी में मीरास से महरूम कर दिया गया, तो दादा को चाहिए कि वह अपनी वसीयत के ज़रिए पोते को कुछ हिस्सा दे। अगर दादा ऐसा न करे, तो यह नैतिक ज़िम्मेदारी वारिसों की बनती है — कि वे अपनी मर्ज़ी से अपने हिस्से में से कुछ अता करें।
⚠️ लेकिन याद रहे: यह हिस्सा नाबालिग वारिस के हिस्से से नहीं लिया जा सकता, न ही ग़ैर-मौजूद वारिस के हिस्से से। यह काम सिर्फ़ बालिग़ वारिसों की मर्ज़ी और रज़ामंदी से होना चाहिए।

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