Transliteration: (Wabtalul yataamaa hattaaa izaa balaghun nikaaha fa in aanastum minhum rushdan fad fa'ooo ilaihim amwaalahum wa laa ta' kuloohaaa israafanw wa bidaaran ai yakbaroo; wa man kaana ghaniyyan falyasta' fif wa man kaana faqeeran fal ya' kul bilma'roof; fa izaa dafa'tum ilaihim amwaalahum fa ash-hidoo 'alaihim; wa kafaa billaahi Haseeba)
"परीक्षा लेने" का मतलब है कि उन्हें थोड़ा सा माल देकर ख़रीदारी के लिए भेजा जाए, ताकि देखा जा सके कि क्या वे समझदारी और सूझबूझ से माल का इस्तेमाल करते हैं या नहीं। इससे यह शिक्षा मिलती है कि असली अक़्ल खर्च करने में है, न कि केवल कमाने में। बच्चों को दुनियावी हुनर के साथ-साथ दीनी तालीम देना भी ज़रूरी है।
इस आयत के आधार पर दो रायें हैं:
कुछ संरक्षक अनाथों का माल शादी-विवाह में फ़ुज़ूल खर्च करके बर्बाद कर देते हैं, और उनकी भलाई की परवाह नहीं करते। कुछ लोग बुनियादी ज़रूरतों पर भी ज़्यादा वसूल करते हैं। ये सब काम इस आयत के तहत सख़्त मना हैं।
अगर संरक्षक ग़रीब हो, तो वह उचित और ज़रूरी हद तक अनाथ के माल से फ़ायदा उठा सकता है। क्योंकि अनाथ की देखभाल एक दीनी ज़िम्मेदारी है। इसी तरह, इमामत, मदरसे में तालीम देने जैसी खिदमात के बदले में उज्र लेना जायज़ है, जैसे कि खुलफ़ा-ए-राशिदीन में से कुछ ने लिया।
"गवाह बनाओ" का हुक्म ज़रूरी नहीं, बल्कि मुस्तहब (प्रेरणादायक) है। जहां माली झगड़े का डर हो, वहां गवाह बनाना बहतर और ऐहतियात है। इससे ये भी सीख मिलती है कि हर हुक्म फ़र्ज़ नहीं होता, कुछ हुक्म इंसाफ़ और दिल की तसल्ली के लिए होते हैं।
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