Transliteration: (Wa izaa jaaa'ahum amrum minal amni awil khawfi azaa'oo bihee wa law raddoohu ilar Rasooli wa ilaaa ulil amri minhum la'alimahul lazeena yastambitoonahoo minhum; wa law laa fadlul laahi 'alaikum wa rahmatuhoo lattaba'tumush Shaitaana illaa qaleelaa)
यह उन भले लेकिन सादा मुसलमानों के बारे में है जो हर सुनी-सुनाई बात फैला देते थे—चाहे वह उम्मीद की हो या डर की।
उन्हें यह एहसास नहीं था कि कौन-सी जानकारी आम करनी चाहिए और कौन-सी नहीं।
इससे सबक़:
"अहलुल-अमर" से मुराद है—हज़रत मुहम्मद ﷺ के वह सहाबी जो इल्म, तजुर्बे और दानाई में माहिर थे, जैसे:
इससे एक अहम उसूल मालूम हुआ:
इससे पता चला कि सहाबा-ए-किराम (रज़ि.) में से कोई भी गुमराह नहीं हुआ।
अल्लाह के फ़ज़ल और रहमत ने उन्हें शैतान से महफ़ूज़ रखा।
हाँ, उनके मरतबे अलग-अलग थे, लेकिन हर एक अपने दर्जे में सच्चाई और स्थिरता पर क़ायम रहा।
यह आयत उस गलत दावे की भी तस्दीक़ करती है कि कोई सहाबी शैतान के पीछे चला गया—ऐसा नहीं हुआ।
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