Transliteration: (Afalaa yatadabbaroonal Qur'aan; wa law kaana min 'indi ghairil laahi la wajadoo fee ikhtilaafan kaseeraa)
कुरआन की आयतों पर ग़ौर, सोच-विचार और गहरी तफ़क्कुर करना अपने आप में एक इबादत है। इस्लाम के आलिमों के अनुसार:
एक आयत को समझकर पढ़ना, बिना समझे हज़ार आयतें पढ़ने से बेहतर है।
कुरआन पर चर्चा करना, उसे अदब से देखना और उसके मानी पर सोच-विचार करना—all ये नेक काम हैं।
लेकिन याद रहे: हर व्यक्ति कुरआन की तफ़्सीर का हक़दार नहीं।
जैसे बिना तालीम वाला शख़्स दवा लिखकर किसी की ज़िंदगी खतरे में डाल सकता है, वैसे ही बिना इल्म वाला कुरआन की गलत तफ़्सीर कर लोगों के ईमान को नुकसान पहुंचा सकता है।
ग़ौर करने की गहराई और दायरा, माहिरों के मुताबिक़ अलग होता है:
यहाँ "विरोधाभास" से मतलब है कि:
अगर यह अल्लाह की किताब न होती, तो इसकी कुछ भविष्यवाणियाँ गलत निकलतीं,
या कुछ आयतें बहुत असरदार और साहित्यिक रूप से बेहतरीन होतीं, जबकि बाकी कमज़ोर पड़ जातीं—जिससे असंगति पैदा होती।
यह आयत साबित करती है कि कुरआन पूरी तरह विरोधाभास से पाक है।
अगर किसी को इसमें टकराव नज़र आता है, तो यह उसकी समझ की कमी है, न कि कुरआन की खामी।
इस तरह यह आयत कुरआन के इलाही होने की बड़ी दलील है—इसकी निरंतरता, सच्चाई और बुलंदी यह साबित करती है कि यह सिर्फ अल्लाह की ओर से है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat