कुरान - 4:89 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

89
وَدُّواْ لَوۡ تَكۡفُرُونَ كَمَا كَفَرُواْ فَتَكُونُونَ سَوَآءٗۖ فَلَا تَتَّخِذُواْ مِنۡهُمۡ أَوۡلِيَآءَ حَتَّىٰ يُهَاجِرُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِۚ فَإِن تَوَلَّوۡاْ فَخُذُوهُمۡ وَٱقۡتُلُوهُمۡ حَيۡثُ وَجَدتُّمُوهُمۡۖ وَلَا تَتَّخِذُواْ مِنۡهُمۡ وَلِيّٗا وَلَا نَصِيرًا

Transliteration: (Waddoo law takfuroona kamaa kafaroo fatakoonoona sawaaa'an falaa tattakhizoo minhum awliyaaa'a hattaa yuhaajiroo fee sabeelil laah; fa in tawallaw fa khuzoohum waqtuloohum haisu wajat tumoohum wa laa tattakhizoo minhum waliyyanw wa laa naseeraa)

वे चाहते हैं कि जिस तरह वे ख़ुद काफ़िर हुए, उसी तरह तुम भी काफ़िर हो जाओ [277], ताकि तुम और वे बराबर हो जाओ। तो उनमें से किसी को भी अपना दोस्त न बनाओ [278] जब तक कि वे अल्लाह की राह में हिजरत न करें [279]। फिर अगर वे पीठ फेर लें (दुश्मनी पर उतर आएं) तो उन्हें पकड़ लो और जहाँ पाओ क़त्ल कर दो [280], और उनमें से किसी को भी अपना दोस्त या मददगार न बनाओ [281]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 89 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 89 की तफ़्सीर

 

✅ [277] मुनाफ़िक़ों की दोस्ती के पीछे धोखेबाज़ मंशा

यहाँ "वे चाहते हैं" से मुराद मुनाफ़िक़ और काफ़िर हैं, जिनका मक़सद ईमान में सच्चाई नहीं था। मुसलमानों से दोस्ती का असली उद्देश्य उन्हें कुफ़्र की तरफ़ खींचना था, इस्लाम में सच्चाई से शामिल होना नहीं। मुसलमानों को छोड़कर मक्का के काफ़िरों से जा मिलना उनकी छुपी हुई ग़द्दारी का सबूत है। इससे पता चला कि किसी को कुफ़्र की तरफ़ बुलाना ख़ुद रिद्दत (मुरतद होना) का काम है।

✅ [278] काफ़िरों और मुरतदों से दोस्ती की मनाही

इस आयत से साबित हुआ कि दोस्ती करना सख़्त हराम है:

  • काफ़िरों से
  • मुरतदों से
  • दीन से फिरने वाले गिरोहों से (भले वे ज़बान से कलिमा पढ़ें, जैसे मुनाफ़िक़)
    ऐसे लोगों को मुसलमान कहना भी ग़लत है, जब उनका ईमान खुलकर टूट चुका हो।

✅ [279] हिजरत – सच्चाई की पहचान

"जब तक कि वे हिजरत न करें" का मतलब है कि उन्हें मक्का छोड़कर पूरी सच्चाई से अल्लाह की राह में हिजरत करनी होगी। यह उनकी ईमानदारी का साफ़ सबूत होगा। अगर वे हिजरत से इंकार करें और कहें, "हम मक्का नहीं छोड़ेंगे और सच्चा ईमान नहीं अपनाएँगे", तो:

  • उनका इंकार उनके झूठे इस्लाम को साबित करता है
  • उन्हें मुरतद माना जाएगा
    इससे साफ़ हुआ कि सिर्फ़ ज़बानी कलिमा पढ़ना, बिना अमल के, भरोसे के क़ाबिल नहीं।

✅ [280] मुरतद की सज़ा

इस आयत से यह भी साबित हुआ कि इस्लाम में मुरतद की सज़ा मौत है, बशर्ते कि वह:

  • तौबा करे, और
  • फिर से इस्लाम में लौट आए
    इसके बरअक्स, ग़ैर-मुस्लिम के लिए रास्ते हैं: इस्लाम क़ुबूल करना, जिज़िया अदा करना, क़ैद या क़त्ल। लेकिन मुरतद के लिए सिर्फ़ दो रास्ते हैं: इस्लाम में लौटना या मौत।

✅ [281] दीन में मुशरिकों से मदद न लेना

इससे मालूम हुआ कि दीन के कामों में मुशरिकों से मदद लेना मना है। हाँ, अगर ज़बरदस्त मजबूरी हो तो शरीअत के उसूल "मजबूरी मना चीज़ को जायज़ कर देती है" पर अमल किया जा सकता है, लेकिन यह सिर्फ़ अस्थायी और ज़रूरत की हालत में होगा, आम तरीक़ा नहीं।

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