Transliteration: (Famaa lakum fil munaafiqeena fi'ataini wallaahu arkasahum bimaa kasaboo; A' tureedoona an tahdoo man adallal laahu wa many yudli lillaahu falan tajida lahoo sabeelaa)
जब मुसलमानों पर यह हक़ीक़त साफ़ हो गई कि ये मुनाफ़िक़: जिहाद में शामिल नहीं हुए और काफ़िरों के साथ मिलकर साज़िशें करते रहे, तो वे असल में मुरतद, बाग़ी और मुल्क के ग़द्दार बन चुके थे। इस वजह से वे क़त्ल के मुस्तहिक़ थे। इस पर सहाबा में मतभेद हुआ—एक गिरोह, उनके ज़ाहिरी ईमान को देखते हुए, क़त्ल के ख़िलाफ़ था; दूसरा गिरोह, उनकी रिद्दत और ग़द्दारी को देखते हुए, क़त्ल के हक़ में था। अल्लाह ने दूसरे गिरोह की ताईद की और यह हुक्म स्पष्ट कर दिया कि खुले मुरतद का अंजाम क़त्ल है, चाहे वह ज़बान से कलिमा ही क्यों न पढ़े। ये मुनाफ़िक़ शुरू से ही झूठे थे और उनकी ग़द्दारी ने उनके असल कुफ़्र को ज़ाहिर कर दिया।
यह आयत उन मुनाफ़िक़ों के बारे में नाज़िल हुई जो: मदीना की इस्लामी हुकूमत को नापसंद करते थे, बद्र के लिए नबी ﷺ के साथ निकले, लेकिन रास्ते में मुसलमानों को छोड़कर वापस लौट गए और मक्का के मुशरिकों से जा मिले। मुसलमान इस पर बंट गए—क्या इन्हें सिर्फ़ मुनाफ़िक़ समझा जाए या खुले काफ़िर मानकर सज़ा दी जाए? इस आयत ने फ़ैसला कर दिया कि उनकी ग़द्दारी और कुफ़्फ़ार से दोस्ती ने उन्हें मुरतद बना दिया है। रूहुल बयान के मुताबिक़, काफ़िरों से दोस्ती और ग़द्दारी मिलकर रिद्दत का कारण बन सकती है। इस तरह हुक्म साफ़ हो गया और उनके शरीई दर्जे में कोई शक बाक़ी न रहा।
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