Transliteration: (Wa maa kaana limu'minin ai yaqtula mu'minan illaa khata'aa; waman qatala mu'minan khata'an fa tahreeru raqabatim mu'minatinw wa diyatum musallamatun ilaaa ahliheee illaaa ai yassaddaqoo; fa in kaana min qawmin 'aduwwil lakum wa huwa mu'minun fa tahreeru raqabatim mu'minah; wa in kaana min qawmim bainakum wa bainahum meesaaqun fadiyatum musallamatun ilaaa ahlihee wa tahreeru raqabatim mu'minah; famal lam yajid fa Siyaamu shahraini mutataabi'aini tawbatan minal laah; wa kaanal laahu 'Aleeman hakeemaa)
ग़लती से क़त्ल दो तरह का होता है:
वजह-ए-नुज़ूल:
यह आयत हज़रत अय्याश बिन रबीअ़ा के बारे में उतरी। उन्होंने कसम खाई थी कि हारिस बिन ज़ैद को मारेंगे, यह सोचकर कि वह अभी भी काफ़िर है। लेकिन हारिस इस्लाम क़ुबूल कर चुके थे, और अय्याश को पता न था। उन्होंने उन्हें क़त्ल कर दिया। क़ुरआन ने इसे ग़लती से क़त्ल क़रार दिया।
ग़लती से क़त्ल में दो हक़ होते हैं:
घरवाले दिया माफ़ कर सकते हैं, लेकिन कफ़्फ़ारा माफ़ नहीं कर सकते, क्योंकि वह अल्लाह का हक़ है।
इसलिए जिसने मोमिन को ग़लती से मारा, उसे:
अगर कोई ग़ैर-मुस्लिम क़ौम का व्यक्ति, जो मुसलमानों का दुश्मन है, छुपकर मुसलमान बन गया और ग़लती से मुसलमानों के हाथ मारा गया, तो:
अगर मरा हुआ व्यक्ति ऐसी क़ौम से था जिनसे मुसलमानों का सुलह-मुआहिदा है — चाहे स्थायी (जैसे मुस्लिम हुकूमत के नागरिक) हो या अस्थायी (जैसे शरणार्थी) — तो:
इससे अमन के समझौतों में इंसाफ़ क़ायम रहता है।
ग़लती से क़त्ल के कफ़्फ़ारे में सिर्फ़ मुसलमान ग़ुलाम आज़ाद किया जाएगा।
दूसरे कफ़्फ़ारों (जैसे रोज़ा तोड़ने, ज़िहार आदि) में किसी भी मज़हब का ग़ुलाम आज़ाद किया जा सकता है (हanafī फ़ुक़हा के मुताबिक़)।
इससे मोमिन की ज़िंदगी की अज़मत ज़ाहिर होती है।
हर गुनाह की अपनी अमली तौबा होती है। सिर्फ़ ज़बान से “तौबा, तौबा” कहना काफ़ी नहीं।
इस मामले में:
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat