कुरान - 4:94 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

94
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا ضَرَبۡتُمۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ فَتَبَيَّنُواْ وَلَا تَقُولُواْ لِمَنۡ أَلۡقَىٰٓ إِلَيۡكُمُ ٱلسَّلَٰمَ لَسۡتَ مُؤۡمِنٗا تَبۡتَغُونَ عَرَضَ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا فَعِندَ ٱللَّهِ مَغَانِمُ كَثِيرَةٞۚ كَذَٰلِكَ كُنتُم مِّن قَبۡلُ فَمَنَّ ٱللَّهُ عَلَيۡكُمۡ فَتَبَيَّنُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِمَا تَعۡمَلُونَ خَبِيرٗا

Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo izaa darabtum fee sabeelil laahi fatabaiyanoo wa laa taqooloo liman alqaaa ilaikumus salaama lasta mu'minan tabtaghoona 'aradal hayaatid dunyaa fa'indal laahi maghaanimu kaseerah; kazaalika kuntum min qablu famannnal laahu 'alaikum fatabaiyanoo; innallaaha kaana bimaa ta'maloona Khabeeraa)

ऐ ईमान लाने वालो! जब तुम अल्लाह की राह में निकलो तो ठीक तरह से जाँच-पड़ताल करो, और जो तुम्हें सलाम करे उससे यह न कहो कि तुम मोमिन नहीं हो [302], दुनिया की ज़िंदगी का माल चाहने के लालच में। अल्लाह के पास तो बहुत-सा माल-ए-ग़नीमत है। तुम भी पहले वैसे ही थे [303], फिर अल्लाह ने तुम पर अपना ख़ास फ़ज़्ल किया, तो ठीक तरह से जाँच-पड़ताल करो [304]। निस्संदेह, अल्लाह तुम्हारे कामों से पूरी तरह ख़बरदार है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 94 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 94 की तफ़्सीर

 

✅ [302] नाज़िल होने का कारण – एक मुसलमान का ग़लती से क़त्ल

यह आयत हज़रत मर्दास बिन नुहीक के बारे में नाज़िल हुई, जो फ़िदक के रहने वाले थे। उनकी क़ौम के बाक़ी लोग काफ़िर थे, मगर वे इस्लाम क़ुबूल कर चुके थे, लेकिन मुस्लिम फ़ौज को यह मालूम न था। जब मुसलमानों की फ़ौज पहुँची तो बाक़ी सब भाग गए, मगर हज़रत मर्दास वहीं रुके रहे और फ़ौज को सलाम किया। हज़रत उसामा बिन ज़ैद (रज़ि.) ने यह समझा कि वह सिर्फ़ अपनी बकरियाँ बचाने के लिए सलाम कर रहे हैं, तो उन्होंने उन्हें क़त्ल कर दिया और जानवर ग़नीमत में ले लिए।
इससे यह सबक़ मिलता है कि अगर कोई व्यक्ति ईमान की ज़ाहिरी निशानियाँ दिखाए (जैसे सलाम करना) और कुफ़्र का कोई सबूत न हो, तो उसे काफ़िर क़रार न दिया जाए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर सलाम करने वाला ज़रूरी तौर पर मोमिन ही हो—क्योंकि मुनाफ़िक़ भी सलाम करते थे और नमाज़ पढ़ते थे, फिर भी अल्लाह ने उन्हें झूठा और काफ़िर क़रार दिया: अल्लाह गवाही देता है कि मुनाफ़िक़ बेशक झूठे हैं (सूरा अल-मुनाफ़िक़ून, 63:1)।

✅ [303] अपने शुरुआती दौर को याद करो

तुम भी पहले वैसे ही थे — इस जुमले से मोमिनों को याद दिलाया गया कि इस्लाम के शुरुआती दिनों में उनका ईमान भी सिर्फ़ कलिमा पढ़ने पर क़ुबूल किया गया था, बिना किसी गहरी तहक़ीक़ के। सिर्फ़ ज़बानी इकरार से उनकी जान और माल की हिफ़ाज़त हो जाती थी। अगर उस वक़्त अंदरूनी तस्दीक़ की शर्त रखी जाती तो शायद उनका इस्लाम क़ुबूल न होता।
इसलिए नए मुसलमानों के साथ वही एहतराम और सच्चाई का गुमान रखो, जैसा उस वक़्त तुम्हारे साथ रखा गया था।
इससे यह भी मालूम हुआ कि अगर कोई मुसलमान इस्लामी क़ानून की ग़लत तफ़्सीर की वजह से मारा जाए, तो न क़त्ल की सज़ा होगी, न ख़ून-बहाने का मुआवज़ा। ऐसे शख़्स को न काफ़िर कहा जाएगा, न गुनहगार। हज़रत उसामा बिन ज़ैद, इस वाक़े के बावजूद, क़ुरआन में मोमिन क़रार दिए गए, और उन पर न कोई सज़ा हुई, न मुआवज़ा वाजिब हुआ।

✅ [304] कार्रवाई से पहले तहक़ीक़ की ज़िम्मेदारी

तो ठीक तरह से जाँच-पड़ताल करो — इस हुक्म से यह सबक़ मिलता है कि किसी भी कार्रवाई से पहले, ख़ासकर जंग में, पूरी तहक़ीक़ ज़रूरी है।
अगर कोई मुसलमान गैर-मुसलमानों के बीच रहता हो, और उसका ईमान मालूम न हो, और ग़लती से उसे मार दिया जाए, तो क़ातिल पर न कोई कफ़्फ़ारा है, न ख़ून-बहाने का मुआवज़ा।
इसके बरअक्स, पिछली आयत उस हालात के बारे में थी जब किसी का ईमान मालूम हो, लेकिन हालात की ग़लतफ़हमी (जैसे अंधेरे या अफ़रा-तफ़री में) के कारण क़त्ल हो जाए। दोनों में कोई तकरार नहीं—दोनों आयतें अलग-अलग हालात का बयान करती हैं।

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