कुरान - 4:98 सूरह अन-निसा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

98
إِلَّا ٱلۡمُسۡتَضۡعَفِينَ مِنَ ٱلرِّجَالِ وَٱلنِّسَآءِ وَٱلۡوِلۡدَٰنِ لَا يَسۡتَطِيعُونَ حِيلَةٗ وَلَا يَهۡتَدُونَ سَبِيلٗا

Transliteration: (Illal mustad 'afeena minar rijaali wannisaaa'i walwildaani laa yastatee'oona heelatanw wa laa yahtadoona sabeela)

"मगर वो लोग जो मर्दों, औरतों और बच्चों में से वाक़ई मजबूर हों, जो न तो कोई चाल चल सकते हों [313] और न ही कोई रास्ता पा सकते हों [314]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-निसा आयत 98 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अन-निसा – आयत 98 की तफ़्सीर

 

✅ [313] असल मजबूरी — सच्चा मज़लूम होना

  • यहाँ "मज़लूम" से मुराद वो लोग हैं जो सच में हिजरत करने में असमर्थ हों—जैसे:
    • शारीरिक अपंगता
    • कैद या ज़बरदस्ती रोक दिया जाना
    • दुश्मनों के दबाव या धमकी के कारण निकल न पाना
  • मिसाल: हज़रत अब्बास (RA) — बद्र के दिन काफ़िरों की फ़ौज में थे, लेकिन अपनी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि कुरैश ने मजबूर करके साथ लिया था।
    • इसी वजह से नबी ﷺ ने मुसलमानों को हुक्म दिया कि उन्हें न मारा जाए।
    • इससे इस्लाम का ये उसूल मालूम होता है कि अमल का हुक्म नीयत और हालात के हिसाब से होता है।

✅ [314] ज़रिया या इल्म का न होना — क़ाबिले-माफ़ी वजह

  • अगर कोई व्यक्ति:
    • हिजरत का रास्ता न जानता हो
    • जाने के साधन न रखता हो
    • या बीमार, कमज़ोर या फँसा हुआ हो
      तो वो शरीअत में माफ़ है।
  • ऐसे लोग पिछली आयत में आई सख़्ती के तहत नहीं आते, क्योंकि उनका हाल वाक़ई बेबस है।

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