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إِنَّ ٱلَّذِينَ تَوَفَّىٰهُمُ ٱلۡمَلَـٰٓئِكَةُ ظَالِمِيٓ أَنفُسِهِمۡ قَالُواْ فِيمَ كُنتُمۡۖ قَالُواْ كُنَّا مُسۡتَضۡعَفِينَ فِي ٱلۡأَرۡضِۚ قَالُوٓاْ أَلَمۡ تَكُنۡ أَرۡضُ ٱللَّهِ وَٰسِعَةٗ فَتُهَاجِرُواْ فِيهَاۚ فَأُوْلَـٰٓئِكَ مَأۡوَىٰهُمۡ جَهَنَّمُۖ وَسَآءَتۡ مَصِيرًا
Transliteration: (Innal lazeena tawaffaa humul malaaa'ikatu zaalimeee anfusihim qaaloo feema kuntum qaaloo kunnaa mustad'afeena fil-ard; qaalooo alam takun ardul laahi waasi'atan fatuhaajiroo feehaa; fa ulaaa'ika ma'waahum Jahannamu wa saaa'at maseeraa)
"जिन लोगों की रूह फ़रिश्ते इस हाल में क़ब्ज़ करेंगे कि वो अपने ही ऊपर ज़ुल्म कर रहे थे [311], तो फ़रिश्ते उनसे पूछेंगे — ‘तुम किस हालत में थे?’ वो कहेंगे — ‘हम तो ज़मीन में कमज़ोर थे।’ फ़रिश्ते कहेंगे — ‘क्या अल्लाह की ज़मीन इतनी खुली नहीं थी कि तुम हिजरत कर लेते [312]?’ तो इनका ठिकाना जहन्नम है, और वो क्या ही बुरा ठिकाना है।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)
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