Transliteration: (Muttaki'eena 'alaa rafrafin khudrinw wa 'abqariyyin hisaan)
"हरी मसनदों और निहायत हसीन नादिर क़ालीनों पर तकिया लगाए होंगे [62]!"
हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि 'रफ़रफ़' से मुराद हरे मख़मली मसनद और गद्दे हैं, और 'अबक़री' से मुराद नादिर, हसीन और आला पाए के क़ालीन हैं। अहले अरब में 'अबक़र' उस जगह को कहा जाता था जहाँ निहायत नफ़ीस कपड़े बनते थे, फिर हर बेमिसाल और नायाब चीज़ को 'अबक़री' कहा जाने लगा। जन्नत के फर्श और मसनद अपनी नफ़ासत में लासानी होंगे।
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