Transliteration: (Falamma balagha ma'a hus sa'ya qaala yaa buniya inneee araa fil manaami anneee azbahuka fanzur maazaa taraa; qaala yaaa abatif 'al maa tu'maru satajidunee in shaaa'allaahu minas saabireen)
"फिर जब वह उनके साथ दौड़-धूप की उम्र को पहुँचा [103], तो फ़रमाया: 'ऐ बेटे! मैंने ख़्वाब में देखा कि तुझे ज़बह कर रहा हूँ [104], तेरी क्या राय है [105]?' उसने कहा: 'अब्बा जान! वही कीजिए जिसका हुक्म है [106], आप मुझे साबिर पाएंगे [107]!'"
जब हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) तेरह साल की उम्र को पहुंचे जहाँ वे वालिद माजिद के कामों में हाथ बंटाने लगे, तो अल्लाह की तरफ़ से इम्तिहान का वक़्त आया।
हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने लगातार तीन रातें ख़्वाब देखा कि वे अपने इकलौते बेटे को ज़बह कर रहे हैं। चूँकि अम्बिया का ख़्वाब शैतानी दख़ल से पाक और क़तई वही होता है, इसलिए यह अल्लाह का हुक्म था।
आपने बेटे से राय किसी शक की वजह से नहीं पूछी, बल्कि इसलिए पूछी ताकि बेटा भी अपनी रज़ा से इस अज़ीम सवाब और इम्तिहान में शरीक हो जाए।
हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) ने बिना किसी झिझक के फ़रमाया: ऐ अब्बा जान! आप हुक्मे इलाही को पूरा फ़रमाइए।
उन्होंने अपनी जान की क़ुरबानी को इंशा-अल्लाह कह कर सब्र के साथ पेश किया, जो क़ियामत तक के लिए इताअत का आला तरीन नमूना बन गया।
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