कुरान - 26:67 सूरह अश-शुअरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

67
إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗۖ وَمَا كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Inna fee zaalika la Aayaah; wa maa kaana aksaru hu mu'mineen)

बेशक इसमें बहुत बड़ी निशानी है [75], मगर उनमें से अक्सर लोग ईमान लाने वाले नहीं थे [76]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शुअरा आयत 67 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अश-शुआरा – आयत 67

"बेशक इसमें बड़ी निशानी है [75], मगर उनमें से अक्सर ईमान लाने वाले न थे [76]।"

[75] ज़ालिमों की बर्बादी और मोमिनों की नजात की इब्रतनाक निशानी

इस पूरे वाक़िए में कायनात के तमाम इंसानों के लिए अज़ीम निशानी है कि अल्लाह अपने वलियों की कैसे ग़ैब से मदद फ़रमाता है और ज़ालिमों का कैसा ख़ौफ़नाक अंजाम करता है।

[76] मुशरिकीन की बद-नसीबी

इतनी बड़ी तारीखी हक़ीक़त जानने के बावजूद अक्सर लोग ईमान नहीं लाते और पिछली क़ौमों के अंजाम से कोई सबक़ हासिल नहीं करते।

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