Transliteration: (Illal lazeena aamanoo wa 'amilus saalihaati wa zakarul laaha kaseeranw wantasaroo min ba'di maa zulimoo; wa saya'lamul lazeena zalamooo aiya munqalabiny yanqaliboon (section 11))
"सिवाय उनके जो ईमान लाए, नेक अमल किए [223], अल्लाह का कसरत से ज़िक्र किया [224], और ज़ुल्म के बाद बदला लिया [225]; और ज़ालिम जल्द जान लेंगे कि वे किस करवट उलटते हैं!"
जब यह आयतें नाज़िल हुईं तो हुज़ूर ﷺ के शायर-ए-दरबार हज़रत हस्सान बिन साबित, हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा और हज़रत काब बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हुम रोते हुए हाज़िर हुए कि हम भी शायरी करते हैं। तब यह आयत नाज़िल हुई जिसमें ईमान वाले, नेक अमल करने वाले और दीनी शायरी करने वाले शोअरा को मुस्तस्ना फ़रमाया गया।
मोमिन शायर वह हैं जो अपनी ज़बान व क़लम से अल्लाह की हम्द व सना, हुज़ूर ﷺ की नाअत व मन्क़बत और दीन की सच्चाई बयान करते हैं और कसरत से अल्लाह का ज़िक्र करते हैं। हुज़ूर ﷺ ने हज़रत हस्सान के लिए मस्जिद-ए-नबवी में मिम्बर रखवाया और फ़रमाया: 'ऐ हस्सान! काफ़िरों का जवाब दो, रूहुल क़ुदुस (जिब्रील) तुम्हारी मदद कर रहे हैं।'
जो इस्लाम और हुज़ूर ﷺ की शान पर हमला करने वाले दुश्मनों का शेरों और दलीलों से दिफ़ा करते हैं, उनका यह अमल जिहाद का दर्जा रखता है। आयत के आख़िर में ज़ालिमों और मुशरिकों को सख़्त चेतावनी दी गई कि क़ियामत के दिन और दुनिया में भी वे बहुत जल्द देख लेंगे कि उनकी सरकशी उन्हें जहन्नम के किस गहरे गढ़े में उलटती है!
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