कुरान - 19:26 सूरह मरयम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

26
فَكُلِي وَٱشۡرَبِي وَقَرِّي عَيۡنٗاۖ فَإِمَّا تَرَيِنَّ مِنَ ٱلۡبَشَرِ أَحَدٗا فَقُولِيٓ إِنِّي نَذَرۡتُ لِلرَّحۡمَٰنِ صَوۡمٗا فَلَنۡ أُكَلِّمَ ٱلۡيَوۡمَ إِنسِيّٗا

Transliteration: (Fakulee washrabee wa qarree 'ainaa; fa immaa tarayinnna minal bashari ahadan faqooleee innee nazartu lir Rahmaani sawman falan ukallimal yawma insiyyaa)

'पस खा और पी और अपनी आंखें ठंडी कर; फिर अगर तू किसी इंसान को देखे, तो (इशारे से) कह दे कि 'मैंने रहमान के लिए रोज़े की मन्नत मानी है, इसलिए आज मैं किसी इंसान से हरगिज़ बात नहीं करूँगी।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मरयम आयत 26 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह मरयम - आयत 26

✅ ख़ामोशी का रोज़ा और अल्लाह पर तवक्कुल

हज़रत मरयम को फ़रमाया गया कि दिल को सुकून दो। उस ज़माने की शरीअत में ख़ामोशी का रोज़ा जायज़ था। उन्हें हुक्म हुआ कि लोगों के सवालों पर खुद कोई सफ़ाई न देना, बल्कि इशारे से बता देना कि मेरा ख़ामोशी का रोज़ा है। जवाब देने का ज़िम्मा खुद अल्लाह ने अपने हाथ में लिया।

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