Transliteration: (Wa khuz biyadika dighsan fadrib bihee wa laa tahnas, innaa wajadnaahu saabiraa; ni'mal 'abd; innahooo awwaab)
"और (हमने फ़रमाया:) अपने हाथ में तीलियों का एक मुट्ठा लो और उससे मारो [90] और अपनी क़सम न तोड़ो [91]; बेशक हमने उन्हें साबिर (सब्र करने वाला) पाया, क्या ही बेहतरीन बंदे थे! बेशक वे बहुत रुजूअ करने वाले थे।"
बीमारी के दौरान किसी बात पर आपने क़सम खा ली थी कि तंदुरुस्त होकर अपनी अहलिया को 100 कोड़े मारेंगे। शिफ़ा के बाद अल्लाह ने उनकी अहलिया की ख़िदमत के एवज़ रहम फ़रमाया और हुक्म दिया कि सौ तीलियों की झाड़ू एक मर्तबा मार दो ताकि क़सम भी पूरी हो जाए और उन्हें तकलीफ़ भी न हो।
उस ज़माने की शरीअत में क़सम का कफ़्फ़ारा अदा करने का हुक्म न था, इसलिए अल्लाह ने यह रुख़्सत अता फ़रमाई। बाद में शरीअते मुहम्मदिया में क़सम का कफ़्फ़ारा मुक़र्रर हुआ।
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