Transliteration: (Annaa lahumuz zikraa wa qad jaaa'ahum Rasoolum mubeen)
"उस वक़्त उन्हें नसीहत कहाँ से हासिल होगी [10], जबकि उनके पास एक रसूल तशरीफ़ ला चुके [11] जो साफ़-साफ़ बयान फ़रमाने वाले हैं।"
यह आयत मुनकिरीन के उन झूठे वादों को रद्द फ़रमाती है जो उन्होंने मुसीबत के वक़्त किए थे। अगरचे वे दावा करते थे कि अज़ाब हटने पर वे ईमान लाएंगे, लेकिन अल्लाह तआला ने उनके इस दावे को झूठा क़रार दिया। तारीख़ गवाह है कि जब तकलीफ़ हटाई गई तो वे दोबारा अपने कुफ़्र की तरफ़ पलट गए, जिससे साबित हुआ कि उनका वह इक़रार महज़ दिखावा और मजबूरी था।
चाहे हुज़ूर ﷺ के दौर के क़हत का मामला हो या क़ियामत के क़रीब ज़ाहिर होने वाले धुएं का, उस वक़्त उनका ईमान लाना क़बूल नहीं होगा, क्योंकि अज़ाब देखकर ईमान लाना हक़ीक़ी ईमान नहीं—वह तो ख़ौफ़ की मजबूरी है, दिली यक़ीन नहीं।
आयत में ज़ोर दिया गया है कि उनके पास अल्लाह के सच्चे रसूल ﷺ तशरीफ़ ला चुके, जिन्होंने हक़ को इस तरह वाज़ेह और रौशन फ़रमा दिया कि किसी शक या शुबहे की कोई गुंजाइश बाक़ी न रही। इसके बावजूद उन्होंने मज़ाक़ उड़ाया, झुटलाया और मुंह फेर लिया।
लिहाज़ा, जब अज़ाब नाज़िल हो जाता है तो सच्चे ईमान का दरवाज़ा बंद हो जाता है, क्योंकि उस वक़्त ईमान ग़ैब पर भरोसा नहीं रहता बल्कि आँखों से देखे हुए वाक़िए का इक़रार बन जाता है। ईमान सिर्फ़ उसी वक़्त क़ाबिले-क़बूल है जब वह ग़ैब पर यक़ीन और रसूल की तस्दीक़ की बुनियाद पर हो।
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