Transliteration: (Innaa kaashiful 'azaabi qaleelaa; innakum 'aaa'idoon)
"बेशक हम कुछ मुद्दत के लिए अज़ाब हटाए देते हैं [13], तुम फिर ज़रूर पलटोगे [14]।"
यह आयत मुनकिरीन के इनकार और सरकशी के तरीक़ा-ए-कार को वाज़ेह करती है। जब अल्लाह तआला तंबीह और नसीहत के तौर पर कोई अज़ाब भेजता है, तो इंसानों के पास तौबा करने और ईमान की तरफ़ लौटने का मौक़ा बाक़ी रहता है। लेकिन जब अज़ाब आख़िरी और हलाक करने वाला हो—जैसे फ़िरऔन के डूबने का वक़्त—तो उस वक़्त ईमान लाने का कोई फ़ायदा नहीं होता।
फ़िरऔन को ख़ून, जूँएं, मेंढक और तूफ़ान की कई निशानियाँ तंबीह के तौर पर दिखाई गईं, ताकि वह सुधर जाए। लेकिन जब वह ग़र्क़ होने लगा तो उसका ईमान क़बूल नहीं हुआ।
इसी तरह क़ुरैश पर जो शदीद क़हत मुसल्लत किया गया, वह तंबीह थी, हलाक करने वाला अज़ाब नहीं था। हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की मुबारक दुआ और वसीले से वह मुसीबत टल गई—और इस आयत ने पहले ही ख़बर दे दी कि जब यह मुसीबत हट जाएगी, तो ये लोग फिर अपने कुफ़्र की तरफ़ पलट जाएंगे।
इससे यह भी अज़ीम हक़ीक़त साबित हुई कि मक्के के मुशरिकीन भी इस बात को मानते थे कि हुज़ूर ﷺ अपनी दुआ और तवज्जोह से तकलीफ़ों को दूर फ़रमाने का इख़्तियार रखते हैं। जो लोग आज हुज़ूर ﷺ की शफ़ाअत और वसीले का इनकार करते हैं, वे मक्के के उन मुनकिरीन से भी बदतर सोच रखते हैं।
जैसा कि अल्लाह तआला ने पहले ही फ़रमा दिया था, जब अज़ाब हटा दिया गया तो मुनकिरीन ने अपने वादे का पास न रखा। वे अपनी उसी पुरानी ढिठाई और मज़ाक़ पर लौट आए, जिससे साबित हुआ कि मुसीबत में उनका ईमान का दावा महज़ ख़ौफ़ की वजह से था, दिल से नहीं।
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