कुरान - 44:17 सूरह अद-दुखान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

17
۞وَلَقَدۡ فَتَنَّا قَبۡلَهُمۡ قَوۡمَ فِرۡعَوۡنَ وَجَآءَهُمۡ رَسُولٞ كَرِيمٌ

Transliteration: (Wa laqad fatannaa qablahum qawma Fir'awna wa jaaa'ahum Rasoolun kareem)

और बेशक हमने उनसे पहले फ़िरऔन की क़ौम को आज़माया [16] और उनके पास एक बा-इज़्ज़त रसूल तशरीफ़ लाए [17]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अद-दुखान आयत 17 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अद-दुख़ान तफ़सीर - आयत 17

"और बेशक हमने उनसे पहले फ़िरऔन की क़ौम को आज़माया [16] और उनके पास एक बा-इज़्ज़त रसूल तशरीफ़ लाए [17]।"

[16] नेअमतें अल्लाह की तरफ़ से आज़माइश हैं

यह आयत क़ुरैश को नसीहत देने के लिए एक तारीख़ी मिसाल पेश करती है—यानी फ़िरऔन की क़ौम, जिन्हें इसी तरह आज़माया गया था। उन्हें सल्तनत, बेपनाह दौलत और दुनियावी ठाठ-बाट अता किए गए थे, लेकिन वे हक़ का इनकार करके इस आज़माइश में पूरी तरह नाकाम हो गए।

अल्लाह तआला ने उनकी तरफ़ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को अज़ाब के तौर पर नहीं बल्कि हिदायत के ज़रीए के रूप में भेजा। लेकिन तौबा करने के बजाय उनका तकब्बुर और बढ़ गया। इससे यह सबक़ मिलता है कि दुनियावी दौलत अल्लाह की रज़ा की दलील नहीं होती, बल्कि यह एक आज़माइश होती है कि इंसान शुक्रगुज़ारी और इताअत करता है या तकब्बुर व सरकशी।

[17] अंबिया-ए-किराम का अज़ीम मुक़ाम व एहतिराम

आयत में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को “बा-इज़्ज़त रसूल” (रसूलुन करीम) फ़रमाया गया, जो अल्लाह के नबियों की अज़ीम शान और मुक़द्दस मुक़ाम को उजागर करता है। अंबिया-ए-किराम का अख़लाक़, किरदार और नसब उन्हें अल्लाह की बारगाह में और मख़लूक़ के दरमियान बेहद इज़्ज़त व एहतिराम का हक़दार बनाता है।

अंबिया आम इंसान नहीं होते; अल्लाह तआला उन्हें अपनी ख़ास तहारत, वक़ार और बुज़ुर्गी के लिए चुनता है। इससे यह बात साफ़ हो जाती है कि नबियों की शान में गुस्ताख़ी करना बहुत बड़ा जुर्म है और यह इंसान की अपनी ज़िल्लत का सबब है, नबियों की शान में कोई कमी नहीं आ सकती।

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