कुरान - 44:18 सूरह अद-दुखान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

18
أَنۡ أَدُّوٓاْ إِلَيَّ عِبَادَ ٱللَّهِۖ إِنِّي لَكُمۡ رَسُولٌ أَمِينٞ

Transliteration: (An addooo ilaiya 'ibaadal laahi innee lakum Rasoolun ameen)

यह कहते हुए कि: "अल्लाह के बंदों को मेरे हवाले कर दो [18]; बेशक मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ"। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अद-दुखान आयत 18 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अद-दुख़ान तफ़सीर - आयत 18

"यह कहते हुए कि: 'अल्लाह के बंदों को मेरे हवाले कर दो [18]; बेशक मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ'।"

[18] आज़ादी का मुतालबा और पैग़म्बर का अज़ीम किरदार

इस आयत में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के उस बा-वक़ार और दो-टूक मुतालबा का ज़िक्र है जो उन्होंने फ़िरऔन के सामने रखा: यानी बनी इसराईल (जो अल्लाह के बंदे हैं) को उनकी ग़ुलामी और ज़ुल्म से आज़ाद कर दिया जाए। हज़रत मूसा ने फ़रमाया कि इन्हें मेरे हवाले कर दो ताकि मैं इन्हें आज़ाद करा कर इनके अस्ल वतन ले जाऊं।

बनी इसराईल अस्ल में शाम (सीरिया/फ़िलिस्तीन) के रहने वाले थे, लेकिन हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के दौर में वे मिस्र में आकर मुक़ीम हुए थे। वक़्त गुज़रने के साथ मिस्र के फ़िरऔनियों ने उन्हें ग़ुलाम बना लिया और उन पर बेहद अमानवीय ज़ुल्म ढाए।

यह आयत यह भी सिखाती है कि अल्लाह की रहमत अपने नबियों के वसीले से बंदों तक पहुँचती है। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की रिसालत और जद्दो-जहद ही के ज़रिए बनी इसराईल को ज़ुल्म से आज़ादी और हिदायत मुक़द्दर हुई।

आपने फ़रमाया: “बेशक मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ”—यह साबित करता है कि आपका यह मुतालबा कोई सियासी फ़ायदा नहीं था बल्कि अल्लाह का मुक़द्दस हुक्म और अमानत थी जिसे पूरा करना नबी की अज़ीम ज़िम्मेदारी थी।

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