कुरान - 44:19 सूरह अद-दुखान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

19
وَأَن لَّا تَعۡلُواْ عَلَى ٱللَّهِۖ إِنِّيٓ ءَاتِيكُم بِسُلۡطَٰنٖ مُّبِينٖ

Transliteration: (Wa al laa ta'loo 'alal laahi innee aateekum bisultaanim mubeen)

और यह कि: "अल्लाह के मुक़ाबले में सरकशी न करो [19]; बेशक मैं तुम्हारे पास एक रौशन सनद [20] लेकर आया हूँ"। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अद-दुखान आयत 19 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अद-दुख़ान तफ़सीर - आयत 19

"और यह कि: 'अल्लाह के मुक़ाबले में सरकशी न करो [19]; बेशक मैं तुम्हारे पास एक रौशन सनद [20] लेकर आया हूँ'।"

[19] इताअत की दावत, सरकशी की मनाही

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन और उसकी क़ौम को ख़बरदार फ़रमाया कि अल्लाह तआला के मुक़ाबले में तकब्बुर और सरकशी न करो। आपकी दावत सिर्फ़ बनी इसराईल के लिए नहीं थी बल्कि फ़िरऔन और उसकी क़ौम के लिए भी थी, क्योंकि आप दोनों की तरफ़ नबी बनाकर भेजे गए थे।

यह याद दिलाता है कि जब अल्लाह का नबी पैग़ाम पहुँचाता है, तो उसका इनकार करना सीधे अल्लाह तआला के मुक़ाबले में सरकशी करने के बराबर है, क्योंकि नबी अपनी तरफ़ से नहीं बल्कि अल्लाह के हुक्म से बात करता है।

[20] रिसालत की रौशन सनद और मोजिज़ात

“रौशन सनद” (सुल्तान-ए-मुबीन) से मुराद वे अज़ीम मोजिज़ात हैं जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को दिए गए थे—जैसे लाठी का अज़दहा बन जाना और यदे बैज़ा (चमकता हुआ हाथ)। ये कोई जादू नहीं थे बल्कि अल्लाह की तरफ़ से अता की गई खुली निशानियाँ थीं जो आपकी नुबूवत की हक़्क़ानियत का साफ़ सुबूत थीं।

दलीलें क़ायम हो चुकी थीं, हक़ साफ़ हो चुका था, इसलिए इनकार और सरकशी का कोई उज़्र बाक़ी नहीं रहा था।

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