Transliteration: (Yawma nabtishul batsha tal kubraa innaa muntaqimoon)
"और जिस दिन हम बड़ी सख़्त पकड़ पकड़ेंगे [15], बेशक हम बदला लेने वाले हैं।"
यह आयत इलाही इंतिक़ाम के उस आख़िरी और फ़ैसलाकून लम्हे की ख़बर देती है जब अल्लाह तआला मुनकिरीन को अपनी पूरी क़ुव्वत व जलाल के साथ पकड़ेगा। इसे दो तरह से समझा जा सकता है:
एक तो क़ियामत का दिन, जब कोई भी अल्लाह की पकड़ से बच नहीं सकेगा और हर जान को अपने आमाल का पूरा बदला देना होगा (या ग़ज़वा-ए-बदर का दिन जब मक्के के बड़े-बड़े सरदार क़त्ल हुए)।
दूसरे, काफ़िर की मौत का वक़्त, जो अपने आप में एक सख़्त अज़ाब और ज़िल्लत है, क्योंकि उसकी रूह को बेहद तकलीफ़ के साथ खींचा जाता है और उसी लम्हे से उसका अज़ाब शुरू हो जाता है।
इसके बरअक्स, मोमिन की मौत कोई अज़ाब नहीं बल्कि अपने महबूब हक़ीक़ी (अल्लाह) से मुलाक़ात का बुलावा है। यह ग़ज़ब की नहीं बल्कि रहमत की तरफ़ एक मुक़द्दस सफ़र है।
“बड़ी सख़्त पकड़” (अल-बत्शताल कुबरा) यह ज़ाहिर करती है कि जब अल्लाह की पकड़ आती है तो उससे बचने का कोई रास्ता नहीं रहता। यह उन तमाम लोगों के लिए आख़िरी चेतावनी है जो निशानियों के बावजूद सरकशी पर अड़े रहते हैं।
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