कुरान - 44:32 सूरह अद-दुखान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
وَلَقَدِ ٱخۡتَرۡنَٰهُمۡ عَلَىٰ عِلۡمٍ عَلَى ٱلۡعَٰلَمِينَ

Transliteration: (Wa laqadikh tarnaahum 'alaa 'ilmin 'alal 'aalameen)

और बेशक हमने उन्हें [31] जान-बूझकर [32] उस ज़माने के तमाम जहान वालों पर फ़ज़ीलत अता फ़रमाई। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अद-दुखान आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अद-दुख़ान तफ़सीर - आयत 32

"और बेशक हमने उन्हें [31] जान-बूझकर [32] उस ज़माने के तमाम जहान वालों पर फ़ज़ीलत अता फ़रमाई।"

[31] बनी इसराईल की उस दौर में फ़ज़ीलत

उस मख़सूस ज़माने में बनी इसराईल को दुनिया की तमाम क़ौमों पर बरतरी और फ़ज़ीलत अता की गई थी, क्योंकि वे अंबिया-ए-किराम की औलाद थे। अगरचे फ़िरऔन की क़ौम (क़िब्ती) में से भी जो लोग हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान लाए—जैसे जादूगर और हज़रत आसिया रज़ियल्लाहु अन्हा—उन्हें भी बहुत बुलंद मर्तबे मिले, लेकिन बनी इसराईल को नबियों की नस्ल होने के बाइस मजमूई तौर पर नुमायाँ फ़ज़ीलत हासिल थी।

[32] ईमान और नस्बी शराफ़त का मुक़ाम

यह इस बात की दलील है कि अंबिया की औलाद होना बा-इज़्ज़त और मुतबर्रक है, बशर्ते कि इंसान बा-ईमान हो। अगर कोई शख़्स काफ़िर हो—जैसे हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का बेटा कनआन—तो उसे नबी की औलाद होने का कोई फ़ायदा नहीं पहुँचता।

यहाँ यह बात वाज़ेह रहे कि इस आयत से यह हरगिज़ मुराद नहीं कि बनी इसराईल हुज़ूर अकरम ﷺ की उम्मत से भी अफ़ज़ल हैं। आज कयामत तक के लिए सबसे अफ़ज़ल और मुअज़्ज़म यही उम्मत-ए-मुहम्मदिया है, जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है: “तुम बेहतरीन उम्मत हो जो तमाम इंसानों की हिदायत के लिए निकाली गई हो…” (सूरह आल-ए-इमरान 3:110) और “ऐ नबी की बीवियो! तुम आम औरतों जैसी नहीं हो” (सूरह अल-अहज़ाब 33:32)।

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