Transliteration: (In hiya illaa mawtatunal oolaa wa maa nahnu bimun shareen)
"'यह तो महज़ हमारी पहली और इकलौती मौत [35] है और हम दोबारा नहीं उठाए जाएंगे [36]'।"
फ़िरऔन और उसकी क़ौम की तरह मक्के के मुशरिक भी आख़िरत, क़ियामत और हिसाब-किताब के मुनकिर थे। उनका यह क़ौल उनकी सरकशी का खुला इज़हार था, जिससे वे उसी अज़ाब के हक़दार बन रहे थे जो पिछली क़ौमों पर आया था।
इस्लाम में भी दुनियावी मौत सिर्फ़ एक ही बार आती है, मगर उनका यह कहना तौहीद के तहत नहीं था बल्कि उनका मक़सद आख़िरत की दूसरी ज़िंदगी और हश्र-नश्र का मुकम्मल इनकार करना था।
यह जुमला उनके कुफ़्र के अस्ल सबब को साफ़ करता है—कि वे मरने के बाद दोबारा ज़िंदा किए जाने को नामुमकिन समझते थे। लिहाज़ा, यह कहना कि इंसान सिर्फ़ एक बार मरता है कुफ़्र नहीं, बल्कि मरने के बाद दोबारा उठाए जाने का इनकार करना ही खुला कुफ़्र है।
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