कुरान - 44:37 सूरह अद-दुखान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

37
أَهُمۡ خَيۡرٌ أَمۡ قَوۡمُ تُبَّعٖ وَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡ أَهۡلَكۡنَٰهُمۡۚ إِنَّهُمۡ كَانُواْ مُجۡرِمِينَ

Transliteration: (Ahum khayrun am qawmu Tubba'inw wallazeena min qablihim; ahlaknaahum innahum kaanoo mujrimeen)

क्या वे बेहतर हैं या तुब्बा की क़ौम [38] और जो उनसे पहले थे जिन्हें हमने हलाक कर दिया? बेशक वे सब मुजरिम थे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अद-दुखान आयत 37 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अद-दुख़ान तफ़सीर - आयत 37

"क्या वे बेहतर हैं या तुब्बा की क़ौम [38] और जो उनसे पहले थे जिन्हें हमने हलाक कर दिया? बेशक वे सब मुजरिम थे।"

[38] क़ौम-ए-तुब्बा और बादशाह का ईमान

‘तुब्बा’ यमन के बादशाहों का शाही लक़ब (ख़िताब) था, और यहाँ जिस बादशाह का ज़िक्र है उसका नाम हारिस बिन हम्माल हुमैरी था। वह ज़ाती तौर पर एक सच्चा मोमिन था, लेकिन उसकी क़ौम सरकश काफ़िर थी जो अपनी बगावत के सबब हलाक कर दी गई।

बादशाह तुब्बा ने ही मदीना मुनव्वरा को आबाद किया था और उसने हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ के नाम एक मुक़द्दस ख़त लिखा था, जिसमें उसने अपनी वसीयत की थी कि जब आख़िरी नबी ﷺ तशरीफ़ लाएं तो यह ख़त उनकी ख़िदमत में पेश किया जाए।

जब हुज़ूर अकरम ﷺ मदीना शरीफ़ तशरीफ़ लाए और हज़रत अबू अय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु के मकान में क़ियाम फ़रमाया, तो हज़रत अबू यअला ने वह तारीखी ख़त हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत-ए-अक़दस में पेश किया, और इस तरह सदियों पुरानी तुब्बा की यह तमन्ना पूरी हुई।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now