कुरान - 44:5 सूरह अद-दुखान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

5
أَمۡرٗا مِّنۡ عِندِنَآۚ إِنَّا كُنَّا مُرۡسِلِينَ

Transliteration: (Amram min 'indinaaa; innaa kunnaa mursileen)

हमारे यहाँ से एक हुक्म के तौर पर; बेशक हम हमेशा से रसूल भेजने वाले [3] हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अद-दुखान आयत 5 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अद-दुख़ान तफ़सीर - आयत 5

"हमारे यहाँ से एक हुक्म के तौर पर; बेशक हम हमेशा से रसूल भेजने वाले [3] हैं।"

[3] नुबूवत व रिसालत का दायमी इलाही सिलसिला

यह आयत वाज़ेह फ़रमाती है कि रसूलों का भेजा जाना हमेशा अल्लाह तआला के हुक्म, उसकी हिकमत-ए-कामेला और मख़सूस मक़सद के तहत रहा है। यह कोई नया सिलसिला नहीं बल्कि इंसानी तारीख़ में अल्लाह तआला की एक मुस्तक़िल और मुसलसल सुन्नत रही है।

अल्लाह तआला का यह इरशाद कि “बेशक हम हमेशा से रसूल भेजने वाले हैं” यह ज़ाहिर करता है कि पहली उम्मतों से लेकर आख़िरी नबी ﷺ तक, अल्लाह तआला ने इंसानियत की हिदायत के लिए अपने मुंतख़ब बंदों को मुसलसल भेजा।

हर रसूल को भेजा जाता है:

  • एक मुक़र्ररा इलाही वक़्त पर

  • एक मख़सूस क़ौम या सारी इंसानियत की तरफ़

  • रौशन वह्य और वाज़ेह मक़सद के साथ

यह हक़ीक़त साबित करती है कि नुबूवत अल्लाह तआला की रहमत का अज़ीम इज़हार है, कोई इत्तिफ़ाक़िया वाक़िया नहीं। यह आयत बिलवास्ता हुज़ूर अकरम मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की ख़त्म-ए-नुबूवत और आलमी रिसालत को भी साबित करती है, जिनकी आमद से इंसानियत की हिदायत का यह क़दीम इलाही निज़ाम अपने कमाल और मुकम्मल हुस्न को पहुँच गया।

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