Transliteration: (Innaaa anzalnaahu fee lailatim mubaarakah; innaa kunnaa munzireen)
"बेशक हमने इसे एक बा-बरकत रात [1] में नाज़िल फ़रमाया है, बेशक हम ज़रूर डराने वाले हैं।"
“बा-बरकत रात” (लैलतुन मुबारका) से मुफ़स्सिरीन के नज़दीक बुनियादी तौर पर शब-ए-क़द्र (लैलतुल क़द्र) मुराद है, जो रमज़ानुल मुबारक की सत्ताईसवीं शब है, जिसमें क़ुरआन-ए-करीम को पहली बार उतारा गया। बाज़ मुफ़स्सिरीन इससे शब-ए-मेअराज (लैलतुल मेअराज) या शब-ए-बरात (लैलतुल बरात) यानी शाबानुल मुअज़्ज़म की पंद्रहवीं रात भी मुराद लेते हैं।
इस मुक़द्दस रात में पूरा क़ुरआन-ए-पाक लौह-ए-महफ़ूज़ से आसमान-ए-दुनिया (बैतुल इज़्ज़त) पर यकबारगी उतारा गया, जहाँ से वह हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ पर तेईस (23) साल के अरसे में हस्बे ज़रूरत आहिस्ता-आहिस्ता नाज़िल होता रहा।
यह आयत उस रात की अज़ीम अजमत, तक़द्दुस और रूहानी वुसअत को उजागर करती है जिसमें क़ुरआन नाज़िल हुआ। “बा-बरकत रात” का लफ़्ज़ उस बेपनाह बरकत और रहमत-ए-इलाही की तरफ़ इशारा करता है जो इस रात ज़मीन पर नाज़िल होती है।
जिस तरह क़ुरआन के नुज़ूल ने उस रात को मुक़द्दस व मुतबर्रक बना दिया, ठीक उसी तरह हुज़ूर अकरम ﷺ की विलादत की मुबारक रात—जो साहिब-ए-क़ुरआन हैं—भी बेहद बा-बरकत और अल्लाह के फ़ज़्ल व करम से मालामाल है।
ये दोनों अज़ीम वाक़ियात—यानी क़ुरआन का नुज़ूल और रसूल-ए-करीम ﷺ की तशरीफ़ आवरी—पूरी उम्मत के लिए रूहानी बुलंदी, हिदायत और रहमत-ए-इलाही का सबब हैं।
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