Transliteration: (Feehaa yufraqu kullu amrin hakeem)
"उसमें हर हिकमत वाला काम [2] फ़ैसले के लिए तफ़्सील से बाँट दिया जाता है।"
इस अज़ीम रात में, जिसे शब-ए-क़द्र (या शब-ए-बरात) कहा जाता है, हर अहम मामला—जैसे रिज़्क़, ज़िंदगी, मौत, इज़्ज़त और ज़िल्लत—आने वाले पूरे साल के लिए तय करके मुताअल्लिक़ा फ़रिश्तों के सुपुर्द कर दिया जाता है। ये तमाम उमूर लौह-ए-महफ़ूज़ से निकाल कर उन फ़रिश्तों को सौंप दिए जाते हैं जिनकी यह ज़िम्मेदारी है।
मिसाल के तौर पर, हज़रत इज़राईल अलैहिस्सलाम (मलकुल मौत) को उन तमाम इंसानों की फ़ेहरिस्त दे दी जाती है जिनकी रूहें उस साल क़ब्ज़ की जानी हैं। इसी तरह बारिश, रिज़्क़, हिफ़ाज़त और दीगर उमूर के मुक़र्रर फ़रिश्ते अपने-अपने साल भर के काम का चार्ज हासिल करते हैं।
फ़ैसलों की यह तफ़्सीली तक़सीम यह साबित करती है कि अगरचे मुतलक़ इल्म और क़ुदरत सिर्फ़ अल्लाह तआला ही के लिए मख़सूस है, लेकिन वह फ़रिश्तों को भी उन तमाम उमूर से बा-ख़बर फ़रमा देता है जिन्हें उन्हें उस साल अंजाम देना होता है।
यह आयत एक बेहद अज़ीम अक़ीदे पर रौशनी डालती है: अगर अल्लाह तआला फ़रिश्तों को साल भर पहले के तमाम वाक़ियात और फ़ैसलों से बा-ख़बर फ़रमा सकता है, तो इस बात में कोई शुबहा या तअज्जुब नहीं कि अल्लाह तआला अपने हबीब नबी-ए-अकरम ﷺ को भी आइंदा होने वाले तमाम उमूर और ग़ैब का इल्म अता फ़रमा दे।
लिहाज़ा, अल्लाह की अता और मर्जी से हुज़ूर ﷺ को इल्म-ए-ग़ैब मिलना न सिर्फ़ मुमकिन है बल्कि इस इलाही निज़ाम की मंतक़ से पूरी तरह साबित है। इसमें किसी को कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए कि अल्लाह अपने महबूब रसूल ﷺ को इन तमाम फ़ैसलों और तक़दीरों का कामिल इल्म अता फ़रमाए, जिस तरह वह अपने फ़रिश्तों को बा-ख़बर फ़रमाता है।
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