Transliteration: (Laaa ilaaha illaa Huwa yuhyee wa yumeetu Rabbukum wa Rabbu aabaaa'ikumul awwaleen)
"उसके सिवा कोई माबूद नहीं; वही ज़िंदा करता है और वही मौत देता है [5]; वही तुम्हारा रब है और तुम्हारे पिछले बाप-दादाओं का भी रब है।"
यह आयत ख़ालिस तौहीद का ऐलान फ़रमाती है कि इबादत के लायक़ सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह तआला है, और ज़िंदगी व मौत पर उसका मुतलक़ इख़्तियार है।
इरशाद फ़रमाया “वही ज़िंदा करता है और वही मौत देता है”—यह जिस्मानी ज़िंदगी और मौत की तरफ़ इशारा है, जो खालिस अल्लाह के हुक्म में है। रूह वह वास्ता है जिसके ज़रिए जिस्मानी हयात क़ायम रहती है, और अल्लाह ही है जो इसे वजूद बख़्शता है।
इसके अलावा, रूहानी ज़िंदगी—यानी सच्ची हिदायत, दिल की बेदारी और दायमी कामयाबी—ईमान के ज़रिए हासिल होती है, जिसे हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ लेकर तशरीफ़ लाए। जिस तरह रूह से जिस्म ज़िंदा होता है, उसी तरह ईमान से इंसान को रूहानी हयात मिलती है, जिससे ज़िंदगी बा-मक़सद और बा-नूर बन जाती है।
आयत के आख़िर में फ़रमाया गया कि अल्लाह तुम्हारा भी रब है और तुम्हारे गुज़रे हुए बाप-दादाओं का भी रब है, जो नस्ल-दर-नस्ल इंसानियत के रिश्ते को जोड़ता है।
हमारा जिस्मानी मौरूस (बाप) हज़रत आदम अलैहिस्सलाम हैं, जिनसे तमाम बनी नौ-ए-इंसान का सिलसिला चला। लेकिन हमारा रूहानी नसब हुज़ूर अकरम ﷺ और आपके मुक़द्दस सहाबा-ए-किराम से जुड़ता है, जिन्होंने हक़ का पैग़ाम पहुँचाया और सच्ची बंदगी का रास्ता दिखाया।
अपने जिस्मानी असूल और रूहानी विरसे दोनों को पहचानना इंसान को अल्लाह तआला की कामिल रुबूबियत के तहत अपनी तख़लीक़ के अस्ल मक़सद को समझने में मदद देता है।
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