Transliteration: (Qul limam maa fis samaawaati wal ardi qul lillaah; kataba 'alaa nafsihir rahmah; la yajma 'annakum ilaa Yawmil Qiyaamati laa raiba feeh; allazeena khasirooo anfusahum fahum laa yu'minoon)
इस आयत में सवाल किया गया: "किसका है सब कुछ?" —
ताकि इनकार करने वाले ख़ुद अपने मुंह से मान लें कि यह सब कुछ अल्लाह का है।
अगर वो न मानें, तो नबी ﷺ को हुक्म है कि आप साफ़-साफ़ एलान कर दें।
सवाल का अंदाज़ इंसान के दिल को ज़्यादा असर करता है।
रहमत अल्लाह की सबसे बड़ी सिफ़त है।
इस दुनिया में उसकी रहमत में शामिल है:
जो लोग अलामतों के बावजूद इनकार करते हैं,
वो अपनी जानों को तबाही में डालते हैं।
यहाँ इशारा उन लोगों की तरफ़ हो सकता है
जिनके बारे में अल्लाह का फैसला हो चुका (जैसे: अबू लहब, अबू जहल)।
लेकिन जो लोग ग़लती या ग़फ़लत से इनकार कर रहे हों,
वो अब भी हिदायत पा सकते हैं,
अगर ख़ुलूस से तलाश करें।
नतीजा:
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