Transliteration: (Qad khasiral lazeena kazzaboo biliqaaa'il laahi hattaaa izaa jaaa'at humus Saa'atu baghtatan qaaloo yaa hasratanaa 'alaa maa farratnaa feehaa wa hum yahmiloona awzaarahum 'alaa zuhoorihim; alaa saaa'a ma yaziroon)
हालाँकि क़ियामत से पहले बहुत सारी निशानियाँ आएँगी, लेकिन उसका असल आगमन अचानक और बिना चेतावनी के होगा। जिन्होंने अल्लाह से मिलने का इनकार किया होगा, वे बिलकुल तैयार नहीं होंगे, और यह अचानकपन उनके सदमे और पछतावे को और बढ़ा देगा।
जब वे कहेंगे: "हाय हमारी बदबख़्ती...", तो यह उनकी इस बात की स्वीकृति होगी कि उन्होंने आख़िरत का इनकार किया और तैयारी नहीं की। यह सिर्फ़ अमल की कोताही नहीं, बल्कि ईमान की बुनियादी सच्चाई को न अपनाने का पछतावा होगा।
उस दिन बुरे आमाल पीठों पर बोझ बनकर नमूदार होंगे। इसके उलट, ईमानवाले अपने नेक आमाल के जरिए सहारा पाएँगे — उनकी क़ुर्बानियाँ सवारी बनेंगी। नेक लोग अपने आमाल को हल्का और राहत देने वाला पाएँगे, जबकि बदकार अपने आमाल के बोझ से दम घुटते रहेंगे।
यह साबित करता है कि आमाल क़ियामत के दिन ज़ाहिरी शक्ल अख्तियार कर लेंगे और तौले जाएँगे। काफ़िरों के गुनाह इतने भारी होंगे कि उनकी गर्दनों पर लिपटे हुए होंगे — जिनमें उनकी गलत कमाई और गहनों का misuse भी शामिल होगा। जबकि ईमानवालों के गुनाह हल्के होंगे और उनके नेक आमाल भारी होकर उन्हें उम्मीद और निजात दिलाएँगे।
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