कुरान - 6:33 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

33
قَدۡ نَعۡلَمُ إِنَّهُۥ لَيَحۡزُنُكَ ٱلَّذِي يَقُولُونَۖ فَإِنَّهُمۡ لَا يُكَذِّبُونَكَ وَلَٰكِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ يَجۡحَدُونَ

Transliteration: (Qad na'lamu innahoo layahzunukal lazee yaqooloona fa innahum laa yukazziboonaka wa laakinnaz zaalimeena bi Aayaatil laahi yajhadoon)

हमें यक़ीनन मालूम है कि उनकी बातें तुम्हें दुख पहुंचाती हैं, मगर वे तुम्हें झूठा नहीं कहते [65]; बल्कि ये ज़ालिम तो अल्लाह की आयतों का इनकार करते हैं [66]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 33 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 33 की तफ़्सीर

✅ [65] इनकार नबी ﷺ का नहीं, अल्लाह की आयतों का है

यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब अख़नस बिन शुरीक ने अबू जहल से पूछा: "क्या मुहम्मद ﷺ सच्चे हैं?" तो अबू जहल ने जवाब दिया: "बेशक वह बिल्कुल सच्चे हैं, उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला। मगर हम उन्हें नहीं मानेंगे, क्योंकि तमाम ऊँचे ख़ासिलात पहले ही उनकी क़ौम में हैं। अगर नुबूवत भी उनके पास चली गई, तो बाक़ी सब के लिए क्या बचेगा?" (खज़ाइनुल इरफान)

इस पर अल्लाह अपने महबूब ﷺ को तसल्ली देता है:
"ये लोग तुम्हें झुटलाते नहीं, बल्कि मुझको और मेरी आयतों को झुटला रहे हैं।"

आज भी दुनिया रसूलुल्लाह ﷺ को सच्चा, अमीन, दाना और हकीम मानती है। इससे साफ़ होता है कि जो लोग आपकी नुबूवत का इनकार करते हैं, वे दरअसल अल्लाह की हिदायत का इनकार कर रहे हैं।

✅ [66] असली ज़ुल्म – अल्लाह की निशानियों का इनकार

मक्का के मुशरिकों ने कभी भी रसूल ﷺ की सच्चाई और अमानतदारी का इनकार नहीं किया। वो जानते थे कि आप सादिक़ (सच्चे) और अमीन (ईमानदार) हैं। उनका इनकार पैग़ाम का था, न कि शख़्स का।

इसलिए उनका इनकार और भी बड़ा जुर्म बन गया, क्योंकि अल्लाह को उन्होंने नहीं देखा, लेकिन रसूल ﷺ उनके सामने मौजूद थे — जिनके मौजिज़े, सीरत, और सचाई सब कुछ वो जानते थे।

सुभानअल्लाह! अल्लाह अपने प्यारे नबी ﷺ को कितने लतीफ़ अंदाज़ में तसल्ली देता है!

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