Transliteration: (Wa in kaana kabura 'alaika i'raaduhum fa inistata'ta an tabtaghiya nafaqan fil ardi aw sullaman fis samaaa'i fata' tiyahum bi Aayah; wa law shaaa'al laahu lajama'ahum 'alal hudaa; falaa takoonanna minal jaahileen)
इस आयत में रसूलुल्लाह ﷺ के दिली ग़म की तस्वीर पेश की गई है। काफ़िरों का इंकार, हिदायत से मुँह फेरना, नबी ﷺ को बहुत तकलीफ़ देता था।
लेकिन यह ग़म किसी नाकामी की वजह से नहीं, बल्कि आपकी रहमत, शफ़क़त और उम्मत के लिए फिक्र की वजह से था। जैसे कोई सच्चा हकीम अपने मरीज को मरता देख कर बेचैन हो जाए, वैसे ही रसूल ﷺ की बेचैनी, उनकी रहमत-लिल-आलमीन होने का सुबूत है।
"अगर तुम सुरंग बना सको या सीढ़ी लगा सको..." — यह बात इलाही मुहब्बत और तसल्लीयाँ देने वाले अंदाज़ में कही गई। जैसे कोई शफ़ीक़ उस्ताद अपने महनती शागिर्द को तसल्ली देता है।
यह कोई मलामत नहीं है, बल्कि रसूल ﷺ की कोशिशों की तारीफ़ है — कि आप हद से बढ़कर लोगों को हिदायत देना चाहते हैं। यह फिक्र, शान-ए-नुबूवत का हिस्सा है।
अल्लाह चाहता, तो सब को एक साथ हिदायत दे सकता था। लेकिन यह उसका इरादा नहीं, क्योंकि हिदायत और गुमराही का इम्तिहान इसी दुनिया का असल मक़सद है।
जैसा कि सूरा क़सस (28:56) में कहा गया:
"बेशक, तुम जिसे चाहो हिदायत नहीं दे सकते, बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है।"
यानी, हिदायत देने का इख़्तियार सिर्फ अल्लाह के पास है, और वो अपने इल्म और हिकमत के मुताबिक़ फैसला करता है।
यह जुम्ला रसूल ﷺ के लिए मलामत नहीं, बल्कि ईमान वालों की तर्बियत के लिए है। नबी ﷺ के बारे में तो खुद अल्लाह कहता है (9:128):
"तुम्हारी भलाई के तलबगार हैं।"
इसलिए, यहाँ मक्सद यह बताना है कि अगर कोई हिदायत नहीं पा रहा, तो उसकी वजह अल्लाह की मर्ज़ी है, और हमें इस पर एतराज़ नहीं करना चाहिए।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat