कुरान - 6:35 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

35
وَإِن كَانَ كَبُرَ عَلَيۡكَ إِعۡرَاضُهُمۡ فَإِنِ ٱسۡتَطَعۡتَ أَن تَبۡتَغِيَ نَفَقٗا فِي ٱلۡأَرۡضِ أَوۡ سُلَّمٗا فِي ٱلسَّمَآءِ فَتَأۡتِيَهُم بِـَٔايَةٖۚ وَلَوۡ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَمَعَهُمۡ عَلَى ٱلۡهُدَىٰۚ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلۡجَٰهِلِينَ

Transliteration: (Wa in kaana kabura 'alaika i'raaduhum fa inistata'ta an tabtaghiya nafaqan fil ardi aw sullaman fis samaaa'i fata' tiyahum bi Aayah; wa law shaaa'al laahu lajama'ahum 'alal hudaa; falaa takoonanna minal jaahileen)

और अगर इन लोगों का मुँह फेर लेना तुम्हारे लिए भारी है [68], तो अगर तुम कोई सुरंग ज़मीन में ढूँढ सको या आसमान की सीढ़ी बना सको और उनके पास कोई निशानी ले आओ, [69] (तो ऐसा कर लो)। और अगर अल्लाह चाहता, तो उन सबको हिदायत पर इकट्ठा कर देता [70], इसलिए तुम जाहिलों में से न बनो [71]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 35 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 35 की तफ़्सीर

✅ [68] नबी ﷺ का ग़म – रहमत का अक्स

इस आयत में रसूलुल्लाह ﷺ के दिली ग़म की तस्वीर पेश की गई है। काफ़िरों का इंकार, हिदायत से मुँह फेरना, नबी ﷺ को बहुत तकलीफ़ देता था।

लेकिन यह ग़म किसी नाकामी की वजह से नहीं, बल्कि आपकी रहमत, शफ़क़त और उम्मत के लिए फिक्र की वजह से था। जैसे कोई सच्चा हकीम अपने मरीज को मरता देख कर बेचैन हो जाए, वैसे ही रसूल ﷺ की बेचैनी, उनकी रहमत-लिल-आलमीन होने का सुबूत है।

✅ [69] अल्लाह की लहजे में मोहब्बत भरी तसल्ली

"अगर तुम सुरंग बना सको या सीढ़ी लगा सको..." — यह बात इलाही मुहब्बत और तसल्लीयाँ देने वाले अंदाज़ में कही गई। जैसे कोई शफ़ीक़ उस्ताद अपने महनती शागिर्द को तसल्ली देता है।

यह कोई मलामत नहीं है, बल्कि रसूल ﷺ की कोशिशों की तारीफ़ है — कि आप हद से बढ़कर लोगों को हिदायत देना चाहते हैं। यह फिक्र, शान-ए-नुबूवत का हिस्सा है।

✅ [70] अल्लाह की मर्ज़ी – हिकमत पर मबनी

अल्लाह चाहता, तो सब को एक साथ हिदायत दे सकता था। लेकिन यह उसका इरादा नहीं, क्योंकि हिदायत और गुमराही का इम्तिहान इसी दुनिया का असल मक़सद है।

जैसा कि सूरा क़सस (28:56) में कहा गया:

"बेशक, तुम जिसे चाहो हिदायत नहीं दे सकते, बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है।"

यानी, हिदायत देने का इख़्तियार सिर्फ अल्लाह के पास है, और वो अपने इल्म और हिकमत के मुताबिक़ फैसला करता है।

✅ [71] "जाहिलों में से न बनो" – तबीअतों की तर्बियत

यह जुम्ला रसूल ﷺ के लिए मलामत नहीं, बल्कि ईमान वालों की तर्बियत के लिए है। नबी ﷺ के बारे में तो खुद अल्लाह कहता है (9:128):

"तुम्हारी भलाई के तलबगार हैं।"

इसलिए, यहाँ मक्सद यह बताना है कि अगर कोई हिदायत नहीं पा रहा, तो उसकी वजह अल्लाह की मर्ज़ी है, और हमें इस पर एतराज़ नहीं करना चाहिए।

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