कुरान - 6:37 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

37
وَقَالُواْ لَوۡلَا نُزِّلَ عَلَيۡهِ ءَايَةٞ مِّن رَّبِّهِۦۚ قُلۡ إِنَّ ٱللَّهَ قَادِرٌ عَلَىٰٓ أَن يُنَزِّلَ ءَايَةٗ وَلَٰكِنَّ أَكۡثَرَهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa qaaloo law laa nuzzila 'alaihi Aayatum mir Rabbih; qul innal laaha qaadirun 'alaaa ai yunazzila Aayatanw wa laakinna aksarahum laa ya'lamoon)

और वो कहते हैं, "उसके रब की तरफ़ से उस पर कोई निशानी क्यों नहीं उतारी गई?" [74] कह दो, "बेशक अल्लाह एक निशानी उतारने पर पूरी तरह सक्षम है, लेकिन उनमें से अधिकतर नहीं समझते" [75]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 37 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 37 की तफ़्सीर

✅ [74] घमंड के साथ निशानियों की माँग

काफ़िरों ने घमंड और हठधर्मी से निशानियाँ माँगीं, जैसे कि आसमान से पत्थरों की बारिश या तुरंत सज़ा। हालाँकि, पैग़म्बर ﷺ ने पहले ही कई चमत्कार दिखाए थे, यहाँ तक कि उनकी माँगी गई निशानियाँ भी पेश कीं। फिर भी, उनके ज़िद्दी दिलों ने हक़ को मानने से इनकार कर दिया — जैसे आज के बहस करने वाले, जो किसी भी दलील को मानने के बजाय सिर्फ़ जीतने के लिए इनकार करते हैं। उनका इनकार निशानियों की कमी की वजह से नहीं, बल्कि जानबूझकर हक़ को ठुकराने की वजह से था।

✅ [75] रहमत ने उस सज़ा को रोका जो उन्होंने माँगी थी

अल्लाह निशानियाँ भेजने पर पूरी तरह क़ादिर है — यहाँ तक कि हेलाक करने वाली निशानियाँ भी, लेकिन उसकी हिकमत और रहमत ने उन्हें टाल दिया। अगर उनकी माँगी हुई निशानियाँ पूरी कर दी जातीं, तो वही उनके लिए तबाही का कारण बनतीं। यह पैग़म्बर ﷺ की करुणा ही थी कि ऐसी विनाशकारी निशानियाँ नहीं भेजी गईं। उन्होंने नहीं समझा कि निशानी की ज़िद असल में अपने लिए विनाश बुलाना था।

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