Transliteration: (Wa laqad kuzzibat Rusulum min qablika fasabaroo 'alaa maa kuzziboo wa oozoo hattaaa ataahum nasrunaa; wa laa mubaddila li Kalimaatil laah; wa laqad jaaa'aka min naba'il mursaleen)
इस आयत में रसूलुल्लाह ﷺ को तसल्ली दी जा रही है कि इन्कार और तकलीफ़ें कोई नई बात नहीं हैं। आपसे पहले जितने भी अल्लाह के नबी आए, उन्हें भी झुठलाया गया, और सताया गया, मगर उन्होंने सब्र और इस्तिक़ामत से काम लिया।
वो अपने मिशन से पीछे नहीं हटे, बल्कि दावा-ए-हक़ को जारी रखा, यहाँ तक कि अल्लाह की मदद आ पहुँची — और अख़िरकार फ़तह उन्हीं को मिली।
यह एक इलाही क़ानून है:
हक़ का रास्ता वक़्ती तौर पर रोका जा सकता है, मगर आख़िरकार कामयाबी उसी की होती है।
"अल्लाह की बातों को कोई नहीं बदल सकता" — इसका मतलब है कि उसके वादे, उसके अहकाम, और उसकी किताबें सब अटल हैं। ना कोई उन्हें मिटा सकता है, ना ही बदल सकता है।
इस आयत में यह भी कहा गया कि पिछले नबियों की ख़बरें तुम्हें मिल चुकी हैं। यानी उन रसूलों की कहानियाँ, जिनमें उन्होंने सब्र किया, क़ौम की मुख़ालिफ़त झेली, और फिर अल्लाह की मदद से फ़तह पाई — यह सब रसूल ﷺ के लिए तसल्लीयाँ और मिसालें हैं।
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