Transliteration: (Wa laqad arsalnaaa ilaaa umamim min qablika fa akhaznaahum bil ba'saaa'i waddarraaa'i la'allahum yata darra'oon)
इस आयत में अल्लाह ने एक इलाही उसूल (Divine Pattern) बयान फ़रमाया — कि पहले की क़ौमों को जब रसूल भेजे गए और उन्होंने इनकार किया, तो अल्लाह ने उन्हें सख़्ती और मुसीबत में मुब्तला कर दिया। लेकिन ये आज़माइशें तबाही के लिए नहीं, बल्कि रूहानी जागृति और तौबा की राह खोलने के लिए थीं।
इससे यह हिकमत निकलती है कि दुनियावी तकलीफ़ें हक़ीक़त में अल्लाह की रहमत होती हैं, जो घमंड को तोड़ती हैं, इनसान को झुकना सिखाती हैं, और ईमान व तौबा की तरफ़ ले जाती हैं।
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