कुरान - 6:42 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

42
وَلَقَدۡ أَرۡسَلۡنَآ إِلَىٰٓ أُمَمٖ مِّن قَبۡلِكَ فَأَخَذۡنَٰهُم بِٱلۡبَأۡسَآءِ وَٱلضَّرَّآءِ لَعَلَّهُمۡ يَتَضَرَّعُونَ

Transliteration: (Wa laqad arsalnaaa ilaaa umamim min qablika fa akhaznaahum bil ba'saaa'i waddarraaa'i la'allahum yata darra'oon)

और निश्चित रूप से हमने तुमसे पहले भी बहुत सी उम्मतों की तरफ़ रसूल भेजे। फिर जब उन्होंने (सत्य का इन्कार किया तो) हमने उन्हें कठिनाई और संकट के साथ पकड़ा, ताकि वे विनम्रता अपनाएँ [82]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 42 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 42 की तफ़्सीर

✅ [82] मुसीबतें दिलों को जगाने वाली रहमत होती हैं

इस आयत में अल्लाह ने एक इलाही उसूल (Divine Pattern) बयान फ़रमाया — कि पहले की क़ौमों को जब रसूल भेजे गए और उन्होंने इनकार किया, तो अल्लाह ने उन्हें सख़्ती और मुसीबत में मुब्तला कर दिया। लेकिन ये आज़माइशें तबाही के लिए नहीं, बल्कि रूहानी जागृति और तौबा की राह खोलने के लिए थीं।

इससे यह हिकमत निकलती है कि दुनियावी तकलीफ़ें हक़ीक़त में अल्लाह की रहमत होती हैं, जो घमंड को तोड़ती हैं, इनसान को झुकना सिखाती हैं, और ईमान व तौबा की तरफ़ ले जाती हैं।

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