कुरान - 6:41 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

41
بَلۡ إِيَّاهُ تَدۡعُونَ فَيَكۡشِفُ مَا تَدۡعُونَ إِلَيۡهِ إِن شَآءَ وَتَنسَوۡنَ مَا تُشۡرِكُونَ

Transliteration: (Bal iyyaahu tad'oona fa yakshifu maa tad'oona ilaihi in shaaa'a wa tansawna maa tushrikoon)

बल्कि तुम उसी को पुकारोगे। फिर यदि वह चाहे, तो उस मुसीबत को हटा देगा, जिसके लिए तुम उसे पुकारते हो [80], और तुम उन साझीदारों को भूल जाओगे, जिन्हें तुम उसका शरीक ठहराते थे [81]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 41 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 41 की तफ़्सीर

✅ [80] संकट में काफ़िर भी अल्लाह को पुकारते हैं

इस आयत में बताया गया है कि जब सख़्त मुसीबत आती है, तो काफ़िर और मुशरिक भी अल्लाह को ही पुकारते हैं, अपने बनाए हुए बुतों और झूठे खुदाओं को छोड़ देते हैं। इससे यह साबित होता है कि अल्लाह की रहमत इतनी व्यापक है कि वह चाहे तो काफ़िरों की दुआ भी क़ुबूल कर सकता है। यह उसकी तालीम, रहमत और क़ुदरत का बयान है, और यह भी कि बेबस इनसान जब घमंड छोड़ देता है, तो फितरतन एक अल्लाह की तरफ़ ही लौटता है।

✅ [81] सच्चाई के लम्हों में बुत भुला दिए जाते हैं

जब इनसान पर कोई असली मुसीबत या मौत का डर छा जाता है, तो वह अपने बुतों और बनावटी खुदाओं को भूल जाता है, और सिर्फ़ अल्लाह को पुकारता है। यह इंसानी रूह में मौजूद तौहीद की फ़ितरी पहचान का सुबूत है, जिसे आराम और गफलत के वक़्त शिर्क की आदतें ढक देती हैं। मगर हक़ीक़त के लम्हे उन सभी परतों को हटा देते हैं, और इनसान अल्लाह को पहचान लेता है।

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