Transliteration: (Awa lam yahdi lillazeena yarisoonal arda mim ba'di ahlihaaa al law nashaaa'u asabnaahum bizunoobihim; wa natba'u 'alaa quloobihim fahum laa yasma'oon)
इस आयत में उन लोगों को चेतावनी दी गई है जो उन बर्बाद हो चुकी क़ौमों की ज़मीन के वारिस बने। जिस तरह पहले लोग अपने गुनाहों की वजह से हलाक किए गए, वैसे ही ये लोग भी तबाह किए जा सकते हैं। मक्का के लोग उन ज़मीनों के वारिस थे जहाँ पहले पाप करने वाले रह चुके थे। यह याद दिलाया गया है कि इख़्तियार और हुकूमत अस्थायी हैं—आज के हाकिम कल का इतिहास बन सकते हैं। ज़मीन तो विरासत में मिली, लेकिन उससे सबक़ नहीं लिया गया। यह आयत तकब्बुर और स्थायित्व के भ्रम से बचने की चेतावनी देती है।
जब लोग लगातार नसीहतों और अलामतों को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो अल्लाह उनके दिलों पर मुहर लगा देता है। फिर वे न समझ पाते हैं, न तौबा कर सकते हैं, न हक़ की तरफ़ लौट सकते हैं। यह सज़ा बेवजह नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई ग़फ़लत का नतीजा होती है। दिल की संवेदनशीलता ख़त्म हो जाती है, और हिदायत पहुँचनी बंद हो जाती है, जिससे एक तरह का अख़लाक़ी बहरापन पैदा हो जाता है। इस रूहानी अंधेपन से बचने के लिए इस्लाम में क़ब्रों की ज़ियारत को पसंद किया गया है ताकि मौत की याद दिल में बनी रहे।
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